गौमाता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने को गोपाष्टमी पर दिल्ली में होगा देशव्यापी आंदोलन : स्वामी गोपालमणी

कहा,सनातन संस्कृति में गाय के बिना सब कुछ शून्य

झांसी। गौमाता को राष्ट्र माता का दर्जा दिलाए जाने के लिए पिछले कई वर्षों से संघर्षरत स्वामी गोपालमणि महाराज गौयात्रा लेकर झांसी पहुंचे। उन्होंने सनातनियों का आह्वान करते हुए गोपाष्टमी पर देश की राजधानी दिल्ली में एकत्र हो कर गौमाता को राष्ट्रमाता घोषित करने के लिए आंदोलन में शामिल होने का आग्रह किया। उन्होंने बताया कि गौमाता राज्य का मुद्दा नहीं है, यह केंद्र का मुद्दा है। उन्होंने बताया कि जब देश के दो राज्यों से प्रस्ताव केंद्र को जा सकता है तो देश के सभी राज्यों से क्यों नहीं जा सकता। उन्होंने यह आशा जताई कि उप्र के मुखिया संत हैं और वह निश्चित ही इस बात का सम्मान रखेंगे। उन्होंने बताया कि सनातन संस्कृति में गौमाता का ही महत्व है उनके बिना मनुष्य के जीवन में कुछ भी संभव नहीं है।

 

हिमालय पर्वत पर एक वर्ष तक गौचारण कराते हुए धेनु मानस की रचना करने वाले संत स्वामी पत्रकारों से वार्ता करते हुए गुरुजी ने बताया कि यह गौ यात्रा है और गंगोत्री से इसका शुभारंभ हुआ है। इसे हम लोग झांसी से आगे जबलपुर में शंकराचार्य जी से मिलने जाएंगे और हमारा उद्देश्य है कि गाय धर्म और आस्था का विषय है। इन सब में जो साक्षी है वह गौ माता है। इसलिए गाय को पशु के दर्जे से हटाकर उसको माता का दर्जा दिया जाए। हमारे जितने भी जो सत्कर्म है उसमें जो साक्षी है वह गाय है, गौमाता है इसलिए गाय को पशु के दर्जे से हटाकर उसको माता का सम्मान मिले। इसलिए हम लोग देश के हर जनपद में जा चुके हैं। भारत की राजधानी दिल्ली में तीन बार पहले आंदोलन किया जा चुका है। 2014 में 2016 में और 2018 में और अब चौथी बार यह जो 2023 में 20 नवंबर को गोपाष्टमी पर पूरे देश के सनातनी एकत्रित होंगे और सरकार से यह मांग रखेंगे की गौ माता को राष्ट्रीय माता का सम्मान मिले। उसके लिए अभी तक हम देश के सभी जनपद में जा चुके हैं। भारत की राजधानी में जा चुके हैं।

 

गुरुजी ने बताया कि इस वक्त जबकि तीन बार आंदोलन कर चुके हैं आज तक गाय के लिए आंदोलन कर रहे हैं फिर भी इस बात को गंभीरता से नहीं लिया गया। जबकि सनातनी के लिए गाय से बढ़कर कुछ भी नहीं है। बताया कि यह सनातनीयों का मुद्दा है और सनातनी जो इस देश में 100 करोड़ है यदि एक करोड़ लोग उठेंगे तो सरकार का ध्यान इस ओर होगा कि गाय हमारी माता है। गुरुजी ने बताया कि जब जरूरत पड़ती है तो संघर्ष करना पड़ता है जो धर्म का जो क्षेत्र है उसके लिए आंख बंद नहीं कर सकते। वास्तव में गाय हमारे धर्म का विषय है। चाहे वह पूजा हो, पाठ हो ,यज्ञ हो, तप हो, कीर्तन हो ,दान हो श्राद्ध हो,तर्पण हो, कथा हो, पिण्डदान हो। धर्म हमारी आस्था है और जब 100 करोड़ लोगों में एक करोड़ लोग इस बात को सरकार के सामने रखेंगे तो सरकार इसे अनदेखा नहीं कर पाएगी। हमारे कोई भी सत्कर्म बिना गाय के नहीं हो सकते तो सरकार ध्यान देगी। सरकार हमको उपेक्षा के भाव से देखती है क्योंकि हम हिंदू कहते हैं अपने आपको,कई लोग तो अपने नाम के आगे हिंदू लिखते हैं और संसद में कहते हैं कि हम गाय का मांस खाते हैं। उन्होंने बताया कि जिस समय हमारे अटल बिहारी वाजपेई जी प्रधानमंत्री थे। जब उन्होंने इस बात को संसद में रखा था तो 2 लोग उनके समर्थन मे खड़े हो गए थे एक थे नायडू जी और एक ममता जी और उन्होंने कहा था कि हम तो गाय का मांस खाते हैं। जब कि वह हिंदू थे।
गुरुजी का मानना है कि जो सनातनी है। वह गाय के महत्व को समझ नहीं पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मैकाले ने कहा था कि शिक्षा में परिवर्तन कर दो। हिंदू हैं पर इनको अंग्रेज बना दो ,गंगा को नदी के रूप में रखा और गाय को पशु के रूप में रखा। जबकि वेद पुराण कह रहे हैं कि गाय पशु नहीं है। इसके उदाहरण देते हुए उन्होंने श्रीरामचरितमानस का जिक्र करते हुए बताया कि जब अंगद और रावण का संवाद होता है। इसमें रावण कहता है कि मैं ब्राह्मण हूं राम तो क्षत्रिय हैं। राम तो बंदरो के साथ खड़ा है। इस पर अंगद जी कहते हैं कि तू रावण ब्राह्मण के घर में भी पैदा होकर गाय को पशु समझ रहा है। गंगा को नदी समझ रहा है और राम को मनुष्य समझ रहा है। इसलिए तुम असुर माने जाओगे और असुर ही तुम्हारा स्वभाव है। इस अवसर पर झांसी में पहली बार गौकथा कराने वाले बुन्देलखण्ड महाविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष कुंवर रामपाल सिंह निरंजन व बबलू यादव भी उपस्थित रहे।

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