लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच ब्राह्मण मतदाता एक बार फिर सियासी दलों के केंद्र में आते दिख रहे हैं। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग के गठजोड़ यानी पीडीए की राजनीति करने वाले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव अब ब्राह्मणों को साधने की कोशिश में जुटे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री और सपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में अखिलेश ने पीडीए के ‘पीडी’ का अर्थ ‘पंडित’ बताया।
अखिलेश ने विकास दुबे एनकाउंटर और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के विजन व उनकी स्मृतियों की कथित उपेक्षा जैसे मुद्दों के जरिए भाजपा पर निशाना साधा। सियासी जानकारों की नजर में यह कोशिश इसलिए अहम है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी करीब 12 से 14 प्रतिशत मानी जाती है और करीब 115 से 120 विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव माना जाता है। पूर्वांचल के कुछ क्षेत्रों में यह हिस्सेदारी 20 प्रतिशत तक बताई जाती है।
राम मंदिर आंदोलन के बाद बदला ब्राह्मणों का रुख
90 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन को लेकर कांग्रेस की नीतियों से नाराज ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर चला गया। इसके पीछे सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दों के प्रति समुदाय का झुकाव भी एक प्रमुख कारण माना गया। इसी दौर में मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस से दूर हुए।
1990 में अयोध्या जा रहे कारसेवकों की गिरफ्तारी और पुलिस कार्रवाई के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को मुस्लिम समुदाय का मजबूत समर्थन मिला। यादव और मुस्लिम मतों के समीकरण ने मुलायम की राजनीतिक जमीन को मजबूती दी। वहीं, ब्राह्मणों के भाजपा के साथ आने से 1991 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।
1993 में सपा और बसपा के गठबंधन ने पिछड़ा, दलित और मुस्लिम समीकरण के सहारे सत्ता हासिल की। हालांकि यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला और बाद में भाजपा और सपा के बीच मुख्य राजनीतिक मुकाबला बन गया।
मायावती ने भी आजमाया था ब्राह्मण कार्ड
2003 में भाजपा से गठबंधन टूटने के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई। उन्होंने दलित और ब्राह्मणों के बीच राजनीतिक समीकरण बनाने के लिए अभियान चलाया। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 86 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें 41 चुनाव जीते। इसके बाद मायावती पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रहीं।
इस दौरान बसपा के नारे भी बदले और पार्टी ने ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ की राजनीति को आगे बढ़ाया। सतीश मिश्र और रामवीर उपाध्याय जैसे ब्राह्मण नेताओं को पार्टी में प्रमुख भूमिका मिली। हालांकि सरकार बनने के कुछ समय बाद दलित और ब्राह्मण कैडर के बीच मतभेद की खबरें सामने आने लगीं।
2012 में सपा ने भी साधे ब्राह्मण
2012 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने भी ब्राह्मणों को साधने की कोशिश की। मुलायम सिंह यादव ने 45 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें 21 चुनाव जीतने में सफल रहे। इसके बाद अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।
हालांकि सरकार के कार्यकाल के दौरान कानून-व्यवस्था, सांप्रदायिक घटनाओं और हिंदू धार्मिक आयोजनों को लेकर उठे सवालों ने ब्राह्मणों के एक वर्ग को सपा से दूर कर दिया। इसके बाद 2017 में भाजपा की प्रचंड जीत के साथ ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा फिर भाजपा के साथ दिखाई दिया।
भाजपा के साथ क्यों जुड़ा ब्राह्मण वोट?
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 68 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें 46 जीतकर विधानसभा पहुंचे। 2022 के चुनाव में भी भाजपा के 46 ब्राह्मण विधायक निर्वाचित हुए।
योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्ववादी राजनीति, कानून-व्यवस्था पर सख्त रुख और सनातन से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देने की नीति को भाजपा के साथ ब्राह्मणों के जुड़ाव की वजहों में गिना जाता है। हालांकि, पिछले कुछ समय से यूजीसी गाइडलाइन, ट्रांसफर-पोस्टिंग और संगठन में प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर ब्राह्मणों की कथित नाराजगी की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं।
पिछले वर्ष दिसंबर में भाजपा विधायक पीएन पाठक के घर ब्राह्मण विधायकों की बैठक और इस पर पार्टी अध्यक्ष पंकज चौधरी की सार्वजनिक नाराजगी के बाद यह मुद्दा और चर्चा में आया।
अखिलेश के सामने बड़ी चुनौती
अखिलेश यादव अब इन्हीं संभावित असंतोष के बीच भाजपा के ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। जनेश्वर मिश्र की जयंती पर प्रबुद्ध सम्मेलन और अयोध्या से पूर्व मंत्री पवन पांडेय को पहला प्रत्याशी घोषित करना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अखिलेश के लिए यह राह आसान नहीं होगी। 2022 से पहले भी सपा ने परशुराम और विष्णु मंदिर बनाने तथा ब्राह्मणों को सम्मान देने जैसे वादों के जरिए इसी तरह की कोशिश की थी, लेकिन उसका चुनावी असर सीमित रहा।
इसके अलावा सपा का पारंपरिक यादव वोट बैंक और ब्राह्मण मतदाताओं के बीच राजनीतिक तालमेल बनाना भी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। वहीं, अखिलेश के सामने मुस्लिम मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखने और ब्राह्मणों को आकर्षित करने के बीच संतुलन साधने की चुनौती भी होगी।
मायावती भी पीछे नहीं
ब्राह्मण वोटों को लेकर बसपा प्रमुख मायावती भी सक्रिय हैं। उन्होंने अपने घोषित उम्मीदवारों में ब्राह्मणों को अच्छी संख्या में जगह दी है। जालौन के माधौगढ़ से आशीष पांडेय को उम्मीदवार घोषित कर उन्होंने ब्राह्मण समुदाय को संदेश देने की कोशिश की है। मायावती पहले भी ब्राह्मण-दलित समीकरण के जरिए सत्ता हासिल कर चुकी हैं। 2007 में उनका प्रयोग सफल रहा था। इस बार भी वह दलित, ब्राह्मण, मुस्लिम और पिछड़े वर्गों के बीच सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रही हैं।
किसके पाले में जाएगा ब्राह्मण वोट?
2027 के चुनाव में सपा और बसपा दोनों ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भाजपा के सामने अपने पुराने सामाजिक समीकरण को मजबूत बनाए रखने की चुनौती है। अखिलेश के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह ब्राह्मणों को आकर्षित करते हुए अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार को किस तरह साथ रख पाएंगे। वहीं मायावती के सामने 2007 वाला सामाजिक समीकरण दोहराने की चुनौती है। ऐसे में यूपी की सियासत में ब्राह्मण वोट किस दल के पक्ष में कितना झुकता है, इसका असर 2027 के विधानसभा चुनाव के कई सीटों के समीकरण पर पड़ सकता है।
