काली नंद गिरी का जीवन बेहद अद्भुत और साधना से जुड़ा है। उन्होंने बचपन में ही माता-पिता को छोड़कर संन्यास का रास्ता अपनाया। 6 साल की उम्र में तंत्र साधना सीखना शुरू किया और 12 साल की उम्र में काशी चली गईं। बाद में असम के कामाख्या धाम में अपने गुरु से तंत्र साधना का प्रशिक्षण प्राप्त किया। अंतरराष्ट्रीय किन्नर अखाड़े की आचार्य डॉ. लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के आशीर्वाद से उन्होंने अखाड़े से जुड़कर आध्यात्मिक साधना जारी रखी।
महामंडलेश्वर बनने के बाद भी उनका जीवन बेहद अनोखा है। पिछले 18 सालों से वे देश-विदेश में भ्रमण करती आई हैं, उनका स्थायी आश्रम नहीं है और उनका निवास मुख्य रूप से श्मशान और अपनी कार में होता है। कार में मां काली का बड़ा चित्र, त्रिशूल और लगभग 70 सिद्ध नरमुंड रखे जाने का दावा किया जाता है।
काली नंद गिरी 18 भाषाओं की जानकार हैं, जिनमें हिंदी, अंग्रेजी, तेलुगु, तमिल, मलयालम, कन्नड़, गुजराती, उड़िया, पंजाबी, असमिया और मराठी शामिल हैं। देश-विदेश की यात्राओं के दौरान उन्होंने ये भाषाएँ सीखी।
महामंडलेश्वर बनने के बाद उनका सोशल मीडिया पर भी खासी लोकप्रियता है। उनके दो अकाउंट हैं, जिनमें कुल 60 लाख फॉलोअर्स हैं। वे नियमित रूप से तंत्र साधना से जुड़े वीडियो और अन्य आध्यात्मिक सामग्री साझा करती हैं, जिनके लाखों व्यूज मिलते हैं।
इस अनोखे जीवन और साधना के कारण काली नंद गिरी दिगंबर अघोरी माता ने न सिर्फ धार्मिक जगत में, बल्कि सोशल मीडिया पर भी लाखों लोगों का ध्यान खींचा है। उनका कहना है कि महामंडलेश्वर बनने के बाद अब वे उज्जैन में अपना स्थायी आश्रम बनाएंगी, ताकि साधना और सेवा कार्य को और विस्तार दे सकें।
