इंसानियत की मिसाल डाॅ. पैन्यूली को जनसेवा एक्सप्रेस की श्रद्धांजलि

(13.05.1960-30.04.2021)

डाॅ. मुहम्मद नईम

चण्डी प्रसाद पैन्यूली, जिन्हें शिक्षा और पत्रकारिता जगत डाॅ. सी. पी. पैन्यूली के नाम से जानता है, को 30 अप्रैल 2021 को कोरोना वायरस ने विधाता के पास जाने को मजबूर कर दिया। मृत्यु के पंजों ने ये भी नहीं सोचा कि उनकी छह वर्ष की बेटी राधिका किसके कंधे पर सिर रखकर सोने की जिद करेगी। हाल ही में 18 वर्ष की दहलीज को छुए पुत्र हर्षित (सोनू) क्या इस दुनिया की मक्कारियों से निपटने में सक्षम हो पायेगा या नहीं। सरलता, सहजता, सौम्यता की प्रतिमूर्ति उनकी पत्नि कादम्बरी क्या अकेले इन सांसारिक जिम्मेवारियों का निर्वहन कर पाएंगी ? एक पल में हंसता खेलता परिवार बेसहारा हो गया और उनके चाहने वाले निःशब्द हो गये।

एक सप्ताह बाद ही उन्हें अपनी स्वर्गवासी मां की स्मृति में, मातृ दिवस के अवसर पर हर वर्ष की तरह हवन-पूजन करना था। उसके चार दिन बाद जीवन के बासठवें वर्ष में प्रवेश का केक काटना था। 19 अप्रैल को जब उनसे बात हुई तो उन्होंने स्वास्थ्य का ख्याल रखने का निर्देश दिया। ये तनिक भी आभास न था कि ये बातचीत अन्तिम होगी।

डाॅ. पैन्यूली से मेरा परिचय वर्ष 2008 में विश्वविद्यालय की एनेक्सी स्थित सुरेश की मैस में हुआ। प्रथम परिचय में ही हम सभी सर की सरलता, सहजता, विनम्रता, सहृदयता के मुरीद हो गये। उनके प्रिय लेखकों में प्रेमचंद एवं गोर्की थे, जो मेरे भी प्रिय थे।

सर स्वाभिमान से उत्तराखण्ड से बुन्देलखण्ड तक के सफर के अनुभवों को साझा करते कि किस प्रकार बाल्यकाल में उन्होंने पिता जितेन्द्र प्रसाद पैन्यूली को खोया। फिर मां व छोटे भाई को संभालते हुए पढ़ाई की। हाईस्कूल के दिनों से ही 10-14 घंटे ट्यूशन कर परिवार की जिम्मेवारियों को संभाला। जीवन भर वह चुनौतियों का सामना हंसते-हंसते करते रहे।

भौतिक विज्ञान उनका प्रिय विषय रहा। 26 अगस्त 2008 को बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी के भास्कर पत्रकारिता एवं जनसंचार संस्थान में उपाचार्य पद का कार्यभार ग्रहण किया तथा विभागाध्यक्ष के पद को सुशोभित किया। विभागीय शिक्षक भी उन्हें अभिभावक एवं मार्गदर्शक मानते। भौतिकी शिक्षक के रुप में 13 वर्ष तथा पत्रकारिता के शिक्षक के रुप में 22 वर्ष से अधिक सेवायें बताती हैं कि आप अध्ययन और अध्यापन के प्रति कितने प्रतिबद्ध थे। वह जब भी अपना बायोडाटा कहीं भेजते, तो उसमें दो विवरण हुआ करते थे, एक भौतिक विज्ञानी के रुप में, दूसरा पत्रकारिता के शिक्षक के रुप में।

भौतिक विज्ञानी के रुप में उनके 21 शोध पत्र प्रकाशित हुए, वहीं पत्रकारिता के शिक्षक के रुप में भी आपने 35 शोध आलेख विभिन्न शोध पत्रिकाओं एवं सम्पादित पुस्तकों के अंश के रुप में प्रकाशित करवाकर शिक्षा जगत को महान योगदान दिया। डाॅ. पैन्यूली बेदाग एवं निर्विवाद रहे। उन्हें अच्छे कपडे पहनने और खाने के शौक था। उद्दण्ड विद्यार्थियों के साथ भी उनका व्यवहार उदारतापूर्ण रहता। वह अक्सर कहा करते थे कि छात्र जीवन के ये दिन वापिस नहीं आयेंगे, आप जितना सीख सकते हैं, सीख लीजिए। शिक्षकों के अनुभवों को आत्मसात कर लीजिए।

जब कभी सर से पूछा जाता कि आप लोगों ने उत्तराखण्ड का निर्माण कैसे करा लिया, तो उनका जबाब रहता कि बुन्देलखण्ड के लोगों में वो प्रतिबद्धता, समर्पण और त्याग अपने राज्य के लिए नहीं है। उत्तराखण्ड के लिए लोगों ने लाठियां, गोलियां खाई, बलात्कार हुए, मांगें उजडी, कोख सूनी हुई, बच्चे अनाथ हुए और भी बहुत कुछ। ऐसा कहते कहते वे भावुक हो जाते।

वे कहते कि बुन्देलखण्ड धन-धान्य और प्राकृतिक सम्पदा से अत्यन्त समृद्ध है। सरकार एक न एक दिन बुन्देखण्ड को राज्य जरुर बनायेगी। बुन्देलखण्डवासी राज्य चाहते तो हैं लेकिन, इस मुद्दे से स्वयं को नहीं जोड पाए। राज्य निर्माण के इतने गुट हैं कि जनता को उन पर विश्वास नहीं है। राज्य निर्माण एवं उसके बाद की स्पष्ट नीति नहीं है। अगर राज्य पाना है तो स्वार्थ, गुटबाजी, मतभेद छोडकर केवल राज्य निर्माण के एजेण्डे पर काम करना होगा।

हम सबके प्यारे डाॅ. पैन्यूली को उनके बासठवें जन्मदिन पर याद करते हुए उन्हें जनाब शकील सरोश साहब के इस शेर के साथ भावभीनी श्रद्धांजलि-

ऐ मिरे साथी, ये तेरे छोड जाने की कसक,
मुझको दीमक की तरह अंदर ही अंदर खाएगी

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