मंदिर में इस विशेष सजावट की परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है। इसके लिए किसी एक व्यक्ति या संस्था पर निर्भर रहने के बजाय सैकड़ों श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार नकदी और आभूषण जमा कराते हैं। इस वर्ष शरद पूर्णिमा से ही नोटों की गड्डियां जमा कराने का सिलसिला शुरू हो गया था। अब तक लगभग दो से तीन हजार श्रद्धालु मंदिर में अपनी राशि जमा करा चुके हैं। भक्तों की ओर से एक रुपये से लेकर 500 रुपये तक के नोटों की गड्डियां दी गई हैं। 5 नवंबर की रात तक रुपये स्वीकार किए गए।
इस परंपरा में केवल रतलाम और आसपास के क्षेत्रों के लोग ही शामिल नहीं होते, बल्कि मध्य प्रदेश के अन्य जिलों और देश के कई राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। गुजरात, कर्नाटक, गोवा, राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों के भक्त सजावट के लिए नोटों की गड्डियां लेकर आए हैं। कुछ श्रद्धालुओं ने विदेशी मुद्रा भी जमा कराई है। मंदिर में जमा नकदी से अलग-अलग आकार की सजावटी आकृतियां बनाई जा रही हैं। इसके साथ ही सोने और चांदी के आभूषणों से भी दरबार को सजाया जा रहा है। पहले आम श्रद्धालुओं से भी जेवर लिए जाते थे, लेकिन अब आभूषणों के लिए कुछ चुनिंदा दुकानदारों से ही सहयोग लिया जाता है।
धनतेरस यानी 6 नवंबर 2026 को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में मां महालक्ष्मी की विशेष पूजा की जाएगी। इसके बाद भक्तों के लिए मंदिर के पट दर्शन के लिए उपलब्ध होंगे। नोटों और आभूषणों से सजा यह दरबार लगातार पांच दिनों तक इसी तरह रहेगा। भाईदूज के बाद श्रद्धालुओं को उनकी जमा कराई गई नकदी और जेवर वापस लौटाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। मंदिर में प्रत्येक श्रद्धालु की जमा राशि और आभूषणों का पूरा हिसाब रखा जाता है।
इस व्यवस्था को पारदर्शी और सुविधाजनक बनाने के लिए ऑनलाइन पंजीयन और टोकन प्रणाली भी लागू की गई है। श्रद्धालुओं को पंजीयन फॉर्म में अपना नाम, मोबाइल नंबर, ई-मेल आईडी, शहर, राज्य, पिन कोड और पूरा पता दर्ज करना होता है। पंजीयन के बाद मिलने वाला नंबर मंदिर में दिखाने पर ऑपरेटर संबंधित जानकारी दर्ज करता है और जमा की जाने वाली राशि स्वीकार करता है। इसके बाद श्रद्धालु के मोबाइल पर ओटीपी भेजा जाता है। ओटीपी दर्ज करने के बाद टोकन तैयार होता है। इसकी दो प्रतियां बनाई जाती हैं, जिनमें से एक भक्त के पास और दूसरी मंदिर समिति के पास रहती है। भाईदूज के बाद रुपये वापस लेने के लिए श्रद्धालुओं को अपना टोकन प्रस्तुत करना होगा।
बड़ी मात्रा में नकदी और कीमती आभूषणों को देखते हुए मंदिर में सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए हैं। परिसर में 24 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, जिनसे चौबीसों घंटे निगरानी की जाती है। चार सुरक्षा गार्ड आठ-आठ घंटे की शिफ्ट में तैनात हैं। पुलिस अधिकारी भी समय-समय पर सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण कर रहे हैं। मंदिर के पास ही माणकचौक पुलिस थाना स्थित होने से सुरक्षा प्रबंधन में अतिरिक्त सुविधा रहती है।
धनतेरस के अवसर पर मंदिर में श्रद्धालुओं को कुबेर पोटली भी वितरित की जाएगी। बुधवार को विधि-विधान से इसका पूजन किया गया। 6 नवंबर को सुबह पांच बजे आरती के बाद पोटली बांटने का सिलसिला शुरू होगा, जो भाईदूज तक चलेगा। लाल कपड़े में तैयार इस पोटली में कमलगट्टा, कौड़ी, चावल, सुपारी, पिस्ता और गोमती चक्र रखे जाते हैं। मान्यता है कि इन वस्तुओं को मां लक्ष्मी को अर्पित करने से व्यापार में उन्नति और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
मंदिर से श्रद्धालुओं की आस्था का जुड़ाव लंबे समय से बना हुआ है। शिक्षिका प्रियंका जोशी पिछले 17 वर्षों से यहां दर्शन के लिए आ रही हैं। इस बार उन्होंने पहली बार सजावट के लिए रुपये जमा कराए। उनका विश्वास है कि पूजा के बाद वापस मिली नोटों की गड्डी घर की तिजोरी में रखने से बरकत बनी रहती है। व्यवसायी लोकेश मित्तल भी अपनी नकदी जमा कराने पहुंचे, ताकि दीपावली पर मंदिर में उनके रुपयों की पूजा हो सके। वहीं, आदर्श द्विवेदी ने पहली बार इस परंपरा में हिस्सा लिया और ऑनलाइन पंजीयन व्यवस्था को सुविधाजनक बताया। इस तरह धनतेरस पर मंदिर की सजावट में हजारों श्रद्धालुओं की भागीदारी देखने को मिल रही है।
