कपास आयात पर सामान्य रूप से 11 प्रतिशत की दर से कस्टम ड्यूटी लगती है। सरकार ने पहले इस शुल्क को 31 अक्टूबर तक हटाने का फैसला किया था। अब समय-सीमा समाप्त होने से पहले वित्त मंत्रालय ने 30 अक्टूबर को अधिसूचना जारी कर छूट को 31 दिसंबर तक बढ़ा दिया। इस निर्णय का प्रमुख उद्देश्य कपड़ा उद्योग को कच्चे माल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करना है, ताकि उत्पादन गतिविधियों पर असर न पड़े।
कपास कपड़ा उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है। इसके दाम बढ़ने पर धागे, कपड़े और तैयार परिधानों की उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है। ऐसे में आयात शुल्क से छूट मिलने पर विदेशी बाजारों से कपास मंगाना अपेक्षाकृत सस्ता होगा। इससे कताई मिलों और गारमेंट निर्माताओं को अपनी लागत नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी। खासतौर पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को इस फैसले से राहत मिलने की उम्मीद है। ये इकाइयां कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण वित्तीय दबाव का सामना कर रही थीं।
आयात शुल्क में छूट बढ़ाने के पीछे घरेलू बाजार में कपास की सीमित उपलब्धता भी एक प्रमुख वजह मानी जा रही है। सामान्य तौर पर अक्टूबर से कृषि मंडियों में नई कपास की आवक बढ़ने लगती है, लेकिन इस साल आवक उम्मीद के मुताबिक नहीं रही। पैदावार में संभावित कमी और बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद में किसानों द्वारा फसल रोककर रखने के कारण मंडियों में कपास की दैनिक आवक करीब 70 हजार से 80 हजार गांठों तक सीमित रही। एक गांठ का वजन 170 किलोग्राम बताया गया है।
उद्योग से जुड़े अनुमानों के मुताबिक, कपास की घरेलू आपूर्ति और खपत के बीच अंतर बना हुआ था। ऐसे में उत्पादन इकाइयों की जरूरत पूरी करने के लिए आयातित कपास पर निर्भरता बढ़ाना जरूरी हो गया था। सरकार के इस फैसले से मिलों को कच्चे माल की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। साथ ही उत्पादन प्रक्रिया में रुकावट आने की आशंका भी कम होगी।
भारतीय कपड़ा उद्योग को वैश्विक बाजार में बांग्लादेश, वियतनाम और कंबोडिया जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। इन देशों में कच्चे माल की लागत और शुल्क व्यवस्था अपेक्षाकृत अनुकूल होने के कारण उनके उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कम कीमत पर उपलब्ध हो पाते हैं। भारत में कपास के शुल्क-मुक्त आयात की सुविधा जारी रहने से घरेलू निर्माताओं को उत्पादन लागत पर नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी। इससे भारतीय निर्यातक समय पर विदेशी ऑर्डर पूरे कर सकेंगे और अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर परिधान उपलब्ध करा सकेंगे।
हालांकि, सरकार ने उद्योग को राहत देने के साथ घरेलू कपास किसानों के हितों का संतुलन बनाए रखने पर भी जोर दिया है। उम्मीद है कि दिवाली के बाद कृषि मंडियों में नई फसल की आवक बढ़ेगी और कपड़ा मिलों की घरेलू खरीद भी जारी रहेगी। सरकार आयातित और घरेलू कपास की कीमतों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए बाजार की स्थिति पर नजर रखेगी।
कुल मिलाकर, कपास आयात शुल्क में छूट को 31 दिसंबर तक बढ़ाने का फैसला कपड़ा उद्योग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे कच्चे माल की उपलब्धता, उत्पादन लागत और निर्यात प्रतिस्पर्धा से जुड़ी चुनौतियों को कम करने में मदद मिल सकती है।
