शबाना का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति को धर्म का पालन करने या प्रार्थना करने से सुकून मिलता है, तो उसे ऐसा करने की आजादी होनी चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म किसी व्यक्ति का निजी मामला है और सरकार को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अपने विचार रखते हुए अभिनेत्री ने परिवार में मिले संस्कारों, बचपन के माहौल और धार्मिक परंपराओं के प्रति अपने नजरिये के बारे में भी बताया।
शबाना ने एक बातचीत के दौरान अपने बचपन और परिवार में धर्म की भूमिका का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनके पिता और मशहूर शायर कैफी आजमी नास्तिक थे, जबकि उनकी मां शौकत आजमी कुछ धार्मिक परंपराओं का पालन करती थीं। हालांकि, उनकी मां भी इन परंपराओं को लेकर बहुत अधिक गंभीर नहीं रहती थीं। शबाना के अनुसार, उनके घर में धार्मिक रीति-रिवाजों को जीवन का अनिवार्य हिस्सा नहीं बनाया गया था।
यही वजह रही कि बचपन से ही धर्म और भगवान को लेकर उनके मन में कोई विशेष जिज्ञासा नहीं रही। अभिनेत्री ने बताया कि वह कभी-कभी बातचीत के दौरान माशाल्लाह और इंशाल्लाह जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हैं। उनके लिए ये शब्द उनकी भाषा और बोलचाल का हिस्सा हैं। हालांकि, उनके पति जावेद अख्तर इन शब्दों के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हैं और उनसे पूछते हैं कि वह ऐसा क्यों कहती हैं। शबाना के मुताबिक, वह इन शब्दों को किसी धार्मिक मान्यता के कारण नहीं, बल्कि अपनी भाषा की सहज अभिव्यक्ति के रूप में इस्तेमाल करती हैं।
जावेद अख्तर की नास्तिक सोच के बारे में बात करते हुए शबाना ने उन्हें कट्टर नास्तिक बताया। उन्होंने कहा कि वह कई बार जावेद से पूछती हैं कि वह अपने धार्मिक विचारों को इतनी मुखरता से क्यों व्यक्त करते हैं। शबाना का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति को धर्म का पालन करने से मानसिक सुकून मिलता है, तो उसे अपनी मान्यताओं के अनुसार जीवन जीने देना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की जरूरत क्यों होनी चाहिए।
शबाना के अनुसार, इस पर जावेद अख्तर का जवाब होता है कि धार्मिक लोग भी उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं। जावेद का तर्क है कि नास्तिक होने के नाते उन्हें भी बुरा महसूस करने का अधिकार है। इस तरह दोनों के बीच धर्म और नास्तिकता को लेकर अलग-अलग नजरिये सामने आते हैं। शबाना ने बातचीत में इन मतभेदों का उल्लेख करते हुए बताया कि धार्मिक विश्वासों के प्रति सम्मान और अपनी बात रखने की स्वतंत्रता, दोनों महत्वपूर्ण विषय हैं।
अपने धार्मिक जुड़ाव के बारे में शबाना ने स्पष्ट कहा कि वह मुस्लिम हैं और उन्हें ईद, उर्दू भाषा तथा खान-पान पसंद है। इसके बावजूद वह नमाज नहीं पढ़तीं और धर्म को अपने जीवन का विशेष हिस्सा नहीं मानतीं। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक परंपराओं का पालन नहीं करने का अर्थ यह नहीं है कि वह दूसरों की आस्था को नहीं समझतीं। अभिनेत्री के अनुसार, धर्म हर व्यक्ति का निजी मामला है। यदि किसी को प्रार्थना करने या धार्मिक गतिविधियों में हिस्सा लेने से खुशी और सुकून मिलता है, तो इसमें उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।
इसी आधार पर उन्होंने कहा कि सरकार को लोगों के व्यक्तिगत धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। शबाना के बयान में अपनी धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत जीवनशैली के बीच अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने अपने और जावेद अख्तर के विचारों का उल्लेख करते हुए बताया कि धार्मिक आस्था रखने और नास्तिक होने वाले लोगों, दोनों की भावनाओं को समझना जरूरी है। उनके विचारों का मुख्य आधार यह है कि व्यक्ति को अपनी मान्यताओं के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और दूसरों की पसंद का भी सम्मान किया जाना चाहिए।
