जिन पांच देशों को इस टैरिफ से छूट मिली है, उनमें भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। ये देश रूस से तेल और गैस खरीदते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसले के तहत इन देशों पर प्रस्तावित 100 प्रतिशत टैरिफ फिलहाल लागू नहीं होगा। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने और उसकी ऊर्जा खरीद से जुड़े व्यापारिक संबंधों को लेकर अमेरिका में चर्चा जारी है।
ट्रंप ने रविवार को मियामी में मीडिया से बातचीत के दौरान अपने निर्णय का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि बहुत से लोगों को अभी यह जानकारी नहीं है कि उनके फैसले का वास्तविक मतलब क्या है। उनके मुताबिक, समय के साथ इस निर्णय के पीछे का उद्देश्य समझ में आएगा। उन्होंने यह भी कहा कि उनका कदम अमेरिका के हित में होगा और वैश्विक स्तर पर भी इसका लाभ देखने को मिल सकता है। हालांकि, उन्होंने अपने बयान में इस फैसले से होने वाले संभावित लाभों का विस्तृत विवरण नहीं दिया।
इससे पहले शुक्रवार को ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत रूस से संबंधित नए प्रतिबंध कानून के कुछ प्रावधानों को लागू करने से छूट दी गई। अमेरिकी कांग्रेस ने सितंबर में इस कानून को पारित किया था। इसमें रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का प्रावधान शामिल था। भारत और चीन समेत पांच देशों को इस कार्रवाई से फिलहाल राहत मिलने के बाद कानून के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
आदेश के अनुसार, यह छूट तब तक लागू रहेगी, जब तक राष्ट्रपति या विदेश मंत्री और वित्त मंत्री यह तय नहीं कर लेते कि आगे क्या कार्रवाई आवश्यक है। इस व्यवस्था के कारण संबंधित देशों पर टैरिफ लगाने का निर्णय तत्काल लागू नहीं हुआ है। हालांकि, इससे भविष्य में टैरिफ लगाने की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती। आगे की कार्रवाई अमेरिकी प्रशासन के निर्णय पर निर्भर करेगी।
ट्रंप के इस कदम की आलोचना उनकी अपनी रिपब्लिकन पार्टी के साथ-साथ डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने भी की है। दोनों दलों के नेताओं ने पिछले महीने इस कानून को भारी बहुमत से पारित किया था। ऐसे में राष्ट्रपति के फैसले को लेकर अमेरिकी राजनीतिक हलकों में मतभेद सामने आए हैं। आलोचकों का मानना है कि रूस पर आर्थिक दबाव बनाने के लिए इस कानून का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
दक्षिण कैरोलिना की रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वह रूस पर दबाव बनाने का विकल्प चुनतीं, ताकि युद्ध समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया जा सके और गैस की कीमतें कम हों। उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर भरोसा नहीं होने की बात भी कही। इस कानून का नाम ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ रखा गया है। यह घटनाक्रम दिखाता है कि रूस से ऊर्जा खरीद और उस पर प्रतिबंधों को लेकर अमेरिकी प्रशासन तथा कांग्रेस के कुछ नेताओं के बीच मतभेद बने हुए हैं।
