इंदौर । ब्रेस्ट कैंसर को अक्सर बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारी माना जाता है लेकिन अब कम उम्र की महिलाओं में भी इसके मामले सामने आ रहे हैं। इंदौर और आसपास के क्षेत्रों में सामने आए कुछ मामलों ने इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से लेने की जरूरत को फिर उजागर किया है। एक निजी कंपनी में काम करने वाली 30 वर्षीय युवती को ब्रेस्ट कैंसर होने के बाद इलाज के साथ भविष्य में मां बनने की चिंता भी सताने लगी। वहीं उज्जैन की 35 वर्षीय महिला ने स्तन में गांठ को शुरुआत में सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज किया लेकिन जांच कराने पर कैंसर की पुष्टि हुई। एक अन्य 33 वर्षीय महिला के मामले में पारिवारिक इतिहास की जांच के दौरान आनुवंशिक कारण सामने आया।
ये मामले बताते हैं कि स्तन में होने वाले बदलावों को नजरअंदाज करना नुकसानदायक हो सकता है। अक्टूबर को दुनिया भर में ब्रेस्ट कैंसर जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान विशेषज्ञ महिलाओं को बीमारी के जोखिम कारकों शुरुआती लक्षणों और उपलब्ध उपचार विकल्पों के बारे में जागरूक रहने की सलाह देते हैं। डॉक्टरों के मुताबिक समय पर पहचान और उचित उपचार से बीमारी से लड़ने की संभावनाएं बेहतर हो सकती हैं।
इंदौर के कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. प्रांजिल मंडलोई के अनुसार अल्कोहल का सेवन धूम्रपान मोटापा और शारीरिक गतिविधियों की कमी जैसे कारकों पर ध्यान देना जरूरी है। नियमित शारीरिक गतिविधि वजन नियंत्रित रखने और हार्मोनल तथा मेटाबॉलिक स्वास्थ्य बेहतर बनाए रखने में मदद करती है। कुछ अध्ययनों में नियमित व्यायाम करने वाली महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का जोखिम कम पाया गया है। हालांकि किसी एक जीवनशैली कारक से हर महिला में कैंसर होने या न होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
कम उम्र में कैंसर का पता चलने पर इलाज के साथ भविष्य में परिवार बढ़ाने की चिंता भी सामने आती है। विशेषज्ञों के मुताबिक कुछ महिलाएं उपचार पूरा होने के बाद मां बन सकती हैं। लेकिन गर्भधारण का सही समय कैंसर के प्रकार उसकी अवस्था और इस्तेमाल किए जाने वाले उपचार पर निर्भर करता है। कुछ दवाएं और कीमोथेरेपी प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए उपचार शुरू करने से पहले ही डॉक्टर से इस विषय पर चर्चा करना उपयोगी है। जरूरत के अनुसार एग फ्रीजिंग या एम्ब्रियो फ्रीजिंग जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। इलाज के बाद गर्भधारण की योजना कैंसर विशेषज्ञ और प्रजनन विशेषज्ञ की सलाह से बनानी चाहिए।
ब्रेस्ट कैंसर के जोखिम का आकलन करते समय पारिवारिक इतिहास भी महत्वपूर्ण होता है। यदि मां बहन नानी मौसी या परिवार के अन्य करीबी सदस्यों को ब्रेस्ट कैंसर हुआ हो तो डॉक्टर से जांच और आनुवंशिक जोखिम के बारे में चर्चा करनी चाहिए। कुछ मामलों में BRCA1 और BRCA2 जैसे जीन में बदलाव बीमारी का खतरा बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञ की सलाह पर आनुवंशिक जांच कराई जा सकती है। यदि किसी परिवार में ऐसे बदलाव की पुष्टि होती है तो दूसरे सदस्यों के जोखिम और स्क्रीनिंग की योजना भी व्यक्तिगत आधार पर तय की जा सकती है।
डॉक्टरों के मुताबिक सामान्य जोखिम वाली महिलाओं को 40 वर्ष की उम्र के बाद मैमोग्राफी स्क्रीनिंग के बारे में चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। हालांकि जांच शुरू करने की उम्र और अंतराल व्यक्तिगत जोखिम तथा लागू दिशा-निर्देशों के आधार पर तय होते हैं। जिन महिलाओं में आनुवंशिक या पारिवारिक जोखिम अधिक है उन्हें कम उम्र से ही विशेष निगरानी की जरूरत हो सकती है।
ब्रेस्ट कैंसर के उपचार में भी कई विकल्प उपलब्ध हुए हैं। अब हर मरीज को कीमोथेरेपी देना जरूरी नहीं होता। कैंसर की बायोलॉजी और स्टेज के अनुसार हॉर्मोन थेरेपी टार्गेटेड थेरेपी इम्यूनोथेरेपी और एंटीबॉडी ड्रग कॉन्जुगेट जैसी दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है।
कुछ मरीजों में जीनोमिक टेस्ट से उपचार के फैसले में मदद मिलती है। वहीं चुनिंदा एडवांस्ड मामलों में लिक्विड बायोप्सी के जरिए खून में मौजूद कैंसर से जुड़े आनुवंशिक बदलावों की जानकारी मिल सकती है। कौन सा उपचार उपयुक्त होगा यह मरीज की रिपोर्ट और बीमारी की स्थिति पर निर्भर करता है।
सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. रितेश तपकिरे के अनुसार स्तन में नई गांठ आकार में बदलाव त्वचा पर सिकुड़न या गड्ढा निप्पल का अंदर की ओर मुड़ना अथवा असामान्य स्राव जैसे लक्षणों पर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। हर गांठ कैंसर नहीं होती लेकिन उसकी वजह की पुष्टि जांच से ही हो सकती है। इसलिए लक्षण बने रहने पर देर किए बिना डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है।
