मामला 8 अक्टूबर को एक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित खबर और 9 अक्टूबर को प्रकाशित समाचार के बाद सामने आया था। आरोपों की पड़ताल के लिए आबकारी विभाग ने दो सदस्यीय जांच दल बनाया। जांच में सात तरह की अनियमितताएं सामने आईं। इनमें 2 करोड़ 75 लाख 53 हजार 535 रुपये की ई-एफडीआर, निर्धारित श्रेणी में शामिल नहीं होने वाले बैंक की प्रतिभूति स्वीकार करना, समय पर पूरी राशि जमा नहीं होना और लाइसेंस ट्रांसफर के दौरान निजी खाते की बैंक गारंटी तथा चेक स्वीकार करना शामिल है।
जांच में सबसे गंभीर मामला AU स्मॉल फाइनेंस बैंक की ई-एफडीआर से संबंधित पाया गया। रिकॉर्ड में 2 करोड़ 75 लाख 53 हजार 535 रुपये की ई-एफडीआर और उसके सत्यापन की रिपोर्ट दर्ज थी। विभाग ने बैंक से इस दस्तावेज की पुष्टि कराई। बैंक ने 12 अक्टूबर को जारी पत्र में स्पष्ट किया कि संबंधित ई-एफडीआर उसके द्वारा जारी नहीं की गई थी। इससे दस्तावेज की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े हुए। जांच में यह भी सामने आया कि एफडीआर के सत्यापन के लिए मई 2024 में विभाग की ओर से पत्र जारी किया गया था, लेकिन संबंधित अधिकारी तक पत्र पहुंचने का रिकॉर्ड नहीं मिला। बैंक को सत्यापन के लिए पत्र भेजे जाने का प्रमाण भी फाइल में उपलब्ध नहीं था। इसके बजाय लाइसेंसी जसवंत के ई-मेल से मिली सत्यापन रिपोर्ट स्वीकार कर ली गई।
जांच दल ने प्रतिभूति स्वीकार करने की प्रक्रिया में भी नियमों के उल्लंघन की बात कही। संबंधित प्रावधानों के अनुसार, केवल निर्धारित तीन श्रेणियों में आने वाले बैंकों की प्रतिभूतियां स्वीकार की जा सकती थीं। रिपोर्ट में कहा गया कि AU स्मॉल फाइनेंस बैंक उस समय इन श्रेणियों में शामिल नहीं था, फिर भी उसकी एफडीआर स्वीकार की गई। ठेकेदार ने प्रतिभूति की आधी राशि 1 करोड़ 37 लाख 76 हजार 768 रुपये नकद जमा की थी। शेष आधी राशि 30 अप्रैल 2024 तक जमा होनी थी, लेकिन यह रकम 12 मई 2024 को जमा की गई। यानी निर्धारित समयसीमा से 22 दिन की देरी हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, इस देरी पर नियमानुसार कार्रवाई करने के बजाय राशि स्वीकार कर ली गई।
मेसर्स मां माइन्स के लाइसेंस ट्रांसफर में भी गड़बड़ियां सामने आईं। फर्म के लाइसेंस हस्तांतरण के लिए 10 जुलाई 2024 को आवेदन मिला था और भोपाल कलेक्टर ने 27 दिसंबर 2024 को आदेश जारी किया। जांच में पाया गया कि साझेदारी से जुड़े दस्तावेजों की पर्याप्त जांच नहीं की गई। एक समझौता पत्र में विजय सिंह को फर्म का साझेदार बताया गया था, जबकि आबकारी पोर्टल पर उपलब्ध पूरक दस्तावेजों में उन्हें साझेदार नहीं बताया गया। नियमों के अनुसार, ट्रांसफर लेने वाली फर्म को पूरी प्रतिभूति जमा करनी थी, लेकिन फर्म के बजाय विजय सिंह की ओर से 76 लाख रुपये की बैंक गारंटी स्वीकार की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय विजय सिंह का फर्म से कोई दर्ज संबंध नहीं था।
जांच रिपोर्ट में फर्म के खाते के बजाय विजय सिंह के निजी बैंक खाते के पोस्ट-डेटेड चेक स्वीकार करने पर भी सवाल उठाए गए। विभागीय पत्राचार में कुछ व्यक्तियों को मां माइन्स का साझेदार या लाइसेंसी बताकर पत्र भेजे गए, जबकि उपलब्ध दस्तावेजों में उनके साझेदार होने की पुष्टि नहीं थी। एक मामले में लाइसेंस ट्रांसफर का आवेदन मिलने से पहले ही संबंधित व्यक्ति को हस्तांतरण से जुड़ा पत्र जारी किए जाने का उल्लेख भी किया गया।
आदेश में इन अनियमितताओं को मध्य प्रदेश राजपत्र में निर्धारित नियमों और आबकारी आयुक्त के निर्देशों का उल्लंघन बताया गया है। विभाग के अनुसार, इन प्रक्रियाओं से सरकारी राजस्व की सुरक्षा जोखिम में पड़ी और अधिकारी ने अपने पद से जुड़े दायित्वों का उचित पालन नहीं किया। इसी आधार पर मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के नियम-9 के तहत रायचूरा को निलंबित किया गया। निलंबन अवधि में उनका मुख्यालय आबकारी आयुक्त कार्यालय, ग्वालियर निर्धारित किया गया है। आदेश में नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता दिए जाने का भी उल्लेख है।
