नई दिल्ली । अंटार्कटिका की बर्फीली दुनिया से वन्यजीवों को लेकर एक चिंताजनक खबर सामने आई है। यहां स्थित जावोडोवस्की द्वीप पर रहने वाले चिनस्ट्रैप पेंग्विन की आबादी में पिछले 14 वर्षों के दौरान भारी गिरावट दर्ज की गई है। कभी दुनिया की सबसे बड़ी चिनस्ट्रैप पेंग्विन कॉलोनी के रूप में पहचाने जाने वाले इस द्वीप पर अब इनकी संख्या पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है। एक नई वैज्ञानिक स्टडी के मुताबिक वर्ष 2011 से 2025 के बीच यहां पेंग्विन के घोंसलों की संख्या में करीब 63 प्रतिशत की कमी आई है। वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार इस दौरान इनकी प्रजनन करने वाली आबादी लगभग 10.9 लाख से घटकर 4.02 लाख रह गई। यानी करीब 6.8 लाख पेंग्विन के बराबर आबादी कम हो गई है। इस बदलाव ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है और समुद्र के बदलते पर्यावरण पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
करंट बायोलॉजी नामक वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते तापमान को पेंग्विन की आबादी में गिरावट से जुड़े संभावित कारणों के रूप में देखा गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक समुद्र का तापमान बदलने से वहां रहने वाले छोटे जीवों की उपलब्धता और उनके फैलाव पर असर पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव उन समुद्री पक्षियों पर पड़ता है जो भोजन के लिए इन्हीं जीवों पर निर्भर रहते हैं। चिनस्ट्रैप पेंग्विन के भोजन में अंटार्कटिक क्रिल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। क्रिल समुद्र में पाए जाने वाले छोटे जीव हैं जो झींगे जैसे दिखाई देते हैं और पेंग्विन समेत कई समुद्री जीवों के लिए भोजन का प्रमुख स्रोत हैं।
ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के वैज्ञानिकों ने पेंग्विन की आबादी और उनकी गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया। इसके तहत ड्रोन से तस्वीरें ली गईं और हवाई तस्वीरों तथा सैटेलाइट रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया। कुछ पेंग्विन पर ट्रैकिंग डिवाइस लगाकर यह समझने की कोशिश भी की गई कि वे भोजन की तलाश में किन इलाकों तक जाते हैं। अध्ययन में सामने आया कि ये पेंग्विन द्वीप के उत्तर-पश्चिम में मौजूद ठंडे पानी वाले क्षेत्रों में भोजन तलाशना पसंद करते हैं। वहां क्रिल मिलने की संभावना रहती है। लेकिन समुद्र के गर्म होने से क्रिल की उपलब्धता और उनके रहने के क्षेत्रों में बदलाव हो सकता है। ऐसी स्थिति में पेंग्विन को भोजन खोजने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है जिससे उनकी सेहत और प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती है।
शोधकर्ताओं ने वर्ष 2016 में जावोडोवस्की द्वीप पर हुए ज्वालामुखी विस्फोट को भी ध्यान में रखा। हालांकि पेंग्विन की आबादी में गिरावट इस घटना से पहले ही शुरू हो चुकी थी। इसलिए वैज्ञानिकों ने विस्फोट को इस लंबे समय से जारी गिरावट का मुख्य कारण नहीं माना है। अध्ययन में समुद्री परिस्थितियों में होने वाले बदलावों को अधिक गंभीरता से समझने की जरूरत पर जोर दिया गया है।
पेंग्विन की संख्या में गिरावट के बाद जावोडोवस्की द्वीप अब दुनिया की सबसे बड़ी पेंग्विन कॉलोनी का दर्जा खो चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक अंटार्कटिका के रॉस सागर में स्थित केप अडारे अब दुनिया की सबसे बड़ी पेंग्विन कॉलोनी के रूप में पहचाना जा रहा है जहां बड़ी संख्या में अडेली पेंग्विन रहते हैं। अध्ययन यह भी संकेत देता है कि पर्यावरण में बदलाव का असर सभी पेंग्विन प्रजातियों पर एक जैसा नहीं पड़ रहा है।
वैज्ञानिकों के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यह समझना है कि जावोडोवस्की द्वीप पर पेंग्विन की आबादी में गिरावट कितनी तेजी से जारी रह सकती है। यदि समुद्र के तापमान और भोजन की उपलब्धता में बदलाव लंबे समय तक जारी रहते हैं तो इन पक्षियों के लिए अपने बच्चों का पालन-पोषण करना और जीवित रहना अधिक कठिन हो सकता है। यह अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन का असर उन दूरस्थ इलाकों में भी दिखाई दे रहा है जहां मानवीय गतिविधियां बहुत सीमित हैं। पेंग्विन की घटती संख्या अंटार्कटिका के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे बदलावों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत बन गई है।
