पाकिस्तान में इस बहस के केंद्र में केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति का बंटवारा भी है। पंजाब और सिंध जैसे प्रभावशाली प्रांतों के छोटे हिस्सों में बंटने से चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। दूसरी ओर, समर्थकों का तर्क है कि छोटे प्रशासनिक क्षेत्र बनने से आम लोगों तक सरकारी सेवाएं पहुंचाना आसान हो सकता है।
चार प्रांतों की जगह 12 से 15 बनाने का विचार
पाकिस्तान फिलहाल चार प्रांतों—पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान—में बंटा है। इनकी आबादी, क्षेत्रफल और राजनीतिक प्रभाव में काफी अंतर है। द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट के हवाले से आई खबरों में इन प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने की संभावना जताई गई है। एक विकल्प में 12 से 15 नए प्रांत बनाने, जबकि दूसरे में 160 छोटे प्रशासनिक क्षेत्र तैयार करने की बात है।
योजना मंत्री अहसान इकबाल ने भी सितंबर में प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की जरूरत बताते हुए इन विकल्पों पर राष्ट्रीय और राजनीतिक चर्चा कराने की बात कही थी। उनके मुताबिक, करीब 26 करोड़ की आबादी वाले देश में मौजूदा व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है और प्रांतीय स्तर पर सत्ता के केंद्रीकरण से स्वास्थ्य, शिक्षा तथा अन्य सेवाओं की डिलीवरी प्रभावित हुई है।
हालांकि, दोनों विकल्पों में बुनियादी अंतर है। नए प्रांत बनाने से देश की संघीय संरचना और प्रांतीय सीमाओं में बदलाव होगा, जबकि सशक्त जिला प्रशासन की व्यवस्था में मौजूदा प्रांतों को बनाए रखते हुए स्थानीय स्तर पर अधिकार और संसाधन बढ़ाए जा सकते हैं।
पंजाब की आबादी, बलूचिस्तान का क्षेत्रफल
पाकिस्तान में नए प्रांत बनाने के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क प्रशासनिक असमानता का दिया जा रहा है। पंजाब देश का सबसे अधिक आबादी वाला प्रांत है। वहीं, बलूचिस्तान क्षेत्रफल के लिहाज से सबसे बड़ा है, लेकिन उसकी आबादी पंजाब की तुलना में काफी कम है।
इतने बड़े और विविध क्षेत्रों का प्रशासन चलाना चुनौतीपूर्ण माना जाता है। दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों को सरकारी सेवाओं तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है। इस लिहाज से छोटे प्रांतों या सशक्त जिला प्रशासन को सेवाओं की पहुंच बेहतर करने के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
लेकिन प्रशासनिक सीमाएं बदलना अपने आप में आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं है। नए प्रांत बनाने पर अलग प्रशासनिक ढांचा, सरकारी संस्थान और अन्य व्यवस्थाएं खड़ी करनी पड़ेंगी। इससे खर्च बढ़ सकता है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह सवाल भी अहम है कि सरकार इतने बड़े पुनर्गठन का खर्च कैसे उठाएगी।
असीम मुनीर की बढ़ती ताकत के बीच क्यों उठे सवाल?
पाकिस्तान में सेना लंबे समय से राजनीति और शासन व्यवस्था में प्रभावशाली भूमिका निभाती रही है। ऐसे में प्रांतों के पुनर्गठन की चर्चा को केवल प्रशासनिक सुधार के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसके संभावित राजनीतिक नतीजों पर भी सवाल उठ रहे हैं।
द इकोनॉमिस्ट की रिपोर्ट पर आधारित विश्लेषणों में आशंका जताई गई है कि बड़े प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने से केंद्र के सामने मौजूद क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति कमजोर हो सकती है। छोटे प्रांतों की सरकारें संसाधनों और प्रशासनिक फैसलों के लिए केंद्र पर अधिक निर्भर हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में केंद्र और सैन्य प्रतिष्ठान का प्रभाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। हालांकि, यह प्रस्ताव के संभावित राजनीतिक असर का विश्लेषण है, न कि इसके घोषित उद्देश्य का प्रमाण।
पंजाब और सिंध का बंटवारा सबसे संवेदनशील
पंजाब और सिंध पाकिस्तान की राजनीति में अहम स्थान रखते हैं। पंजाब को पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) का मजबूत आधार माना जाता है, जबकि सिंध में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) का प्रभाव रहा है।
इन प्रांतों की बड़ी आबादी और चुनावी ताकत उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण बनाती है। यदि इनके क्षेत्रीय और प्रशासनिक ढांचे में बदलाव होता है, तो राजनीतिक दलों के प्रभाव और चुनावी समीकरणों पर भी असर पड़ सकता है।
सिंध में इस मुद्दे पर विरोध खुलकर सामने आ चुका है। सितंबर 2026 में सिंध विधानसभा ने प्रांत को बांटने या उसकी क्षेत्रीय सीमाएं बदलने के प्रस्तावों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था। मुख्यमंत्री मुराद अली शाह ने भी सिंध की भौगोलिक एकता से समझौता नहीं करने की बात कही। इससे स्पष्ट है कि नए प्रांतों का विचार केवल प्रशासनिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रांतीय पहचान और राजनीतिक अधिकारों से भी जुड़ा है।
इमरान खान की पार्टी वाले प्रांत में भी तनाव
पाकिस्तान में प्रांतों के पुनर्गठन की बहस ऐसे समय चल रही है, जब केंद्र और खैबर पख्तूनख्वा की सरकार के बीच राजनीतिक तनाव बना हुआ है। यह प्रांत पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के शासन में है।
इमरान खान जेल में हैं और उनकी पार्टी के समर्थक उनकी रिहाई की मांग करते रहे हैं। इस बीच PTI और केंद्र के बीच टकराव ने संघीय राजनीति को और जटिल बनाया है। खैबर पख्तूनख्वा उग्रवादी हिंसा की समस्या से भी जूझ रहा है।
ऐसे माहौल में प्रांतीय सीमाओं में बदलाव की किसी भी योजना को राजनीतिक नजरिए से देखा जाना स्वाभाविक है। यदि नए प्रांत बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो यह तय करना भी चुनौती होगा कि उनकी सीमाएं कैसे तय होंगी और स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व किस तरह सुनिश्चित किया जाएगा।
बलूचिस्तान में संसाधन और स्थानीय अधिकार भी मुद्दा
बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी हिंसा और केंद्र के साथ संसाधनों के बंटवारे को लेकर विवाद रहे हैं। ऐसे में प्रांत का पुनर्गठन जमीन, प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय राजनीतिक अधिकारों से जुड़े सवाल खड़े कर सकता है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भी शासन व्यवस्था, महंगाई, करों और आर्थिक परिस्थितियों को लेकर असंतोष सामने आता रहा है। इन परिस्थितियों में देश के प्रशासनिक नक्शे में बड़े बदलाव के लिए केवल सरकारी निर्णय पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया, राजनीतिक सहमति और संबंधित क्षेत्रों की चिंताओं पर विचार करना भी जरूरी होगा।
क्या वास्तव में बदल जाएगा पाकिस्तान का नक्शा?
फिलहाल नए प्रांतों की चर्चा को अंतिम सरकारी निर्णय मानना जल्दबाजी होगी। पाकिस्तान में इस विषय पर राजनीतिक बहस चल रही है, लेकिन सितंबर में आई रिपोर्टों के मुताबिक, अतिरिक्त प्रांतों या प्रशासनिक इकाइयों के गठन पर कोई औपचारिक प्रस्ताव संघीय कैबिनेट के सामने नहीं रखा गया था।
छोटे प्रांतों के समर्थक इसे बेहतर प्रशासन और सरकारी सेवाओं की पहुंच बढ़ाने का रास्ता मानते हैं। विरोध करने वालों की चिंता प्रांतीय पहचान, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर है। इसलिए पाकिस्तान के सामने असली चुनौती केवल प्रांतों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि यह तय करने की है कि बदलाव से अधिकार और संसाधन आम लोगों तक पहुंचेंगे या केंद्र की शक्ति और मजबूत होगी।
