यह अध्ययन आईआईटी मंडी से जुड़े शोधकर्ताओं की टीम ने किया है। इसमें कीर्ति कुमार महंत इप्शिता प्रधान और प्रोफेसर डेरिक्स प्रेज शुक्ला शामिल रहे। शोध का सार अगस्त 2026 में इटली के फ्लोरेंस में आयोजित 46वीं कॉसपार वैज्ञानिक सभा में प्रस्तुत किया गया। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान और मौसम में बदलाव जमीन की ऊपरी परत को किस तरह प्रभावित कर रहे हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान जमीन की ऊपरी परत पिघलती है और सर्दियों में फिर जम जाती है। इस हिस्से को सक्रिय परत कहा जाता है। इस परत की गहराई में होने वाला बदलाव वहां के तापमान और पर्यावरणीय परिस्थितियों का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। अध्ययन में सैटेलाइट आंकड़ों के आधार पर मटियान में सक्रिय परत की मोटाई करीब एक से तीन मीटर तक आंकी गई जबकि बारालाचा में यह लगभग आधे मीटर से दो मीटर तक पाई गई।
इन आंकड़ों की वास्तविक स्थिति जांचने के लिए शोधकर्ताओं ने ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार यानी जीपीआर तकनीक का इस्तेमाल किया। यह तकनीक जमीन के भीतर रेडियो तरंगें भेजकर अलग अलग परतों की स्थिति का पता लगाने में मदद करती है। जमीन पर हुई जांच में मटियान में पिघलने वाली परत की गहराई करीब 0.6 से 1.2 मीटर तक मिली। वहीं बारालाचा में यह गहराई लगभग 0.2 से 0.5 मीटर रही। इस अंतर के पीछे अधिक ऊंचाई और अपेक्षाकृत कम तापमान को प्रमुख कारण माना गया है।
शोधकर्ताओं के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सक्रिय परत के नीचे लंबे समय से जमी जमीन मौजूद होती है। तापमान में लगातार बढ़ोतरी होने पर इसके पिघलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसका असर जमीन की मजबूती पानी के प्राकृतिक प्रवाह वनस्पति और कार्बन के प्राकृतिक चक्र पर पड़ सकता है। इसके अलावा हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन और अन्य भू तकनीकी जोखिमों को समझने के लिहाज से भी जमीन के भीतर हो रहे इन बदलावों की निगरानी बेहद जरूरी है।
इस अध्ययन की एक अहम बात यह भी है कि सैटेलाइट और जमीन पर की गई जीपीआर जांच के परिणामों में मजबूत समानता देखने को मिली। इससे वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि भविष्य में सैटेलाइट तकनीक के जरिए उन दुर्गम हिमालयी इलाकों की भी निगरानी की जा सकेगी जहां जमीन पर जाकर लगातार अध्ययन करना बेहद मुश्किल होता है। बदलते तापमान के बीच हिमालय की जमीन में हो रहे ये बदलाव आने वाले समय के पर्यावरणीय और भूगर्भीय जोखिमों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी संकेत माने जा रहे हैं।
