मामले का केंद्र सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट यानी एसडीटीटी में शासन व्यवस्था और निर्णय लेने के अधिकारों से जुड़ा विवाद बताया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार नोएल टाटा और नेविल टाटा के खिलाफ अलग-अलग मुद्दे उठाए गए हैं और इसी वजह से कानूनी स्तर पर पहले से अपनी स्थिति सुरक्षित करने की कोशिश की जा रही है। फिलहाल टाटा ट्रस्ट की ओर से इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की गई है।
विवाद की एक अहम कड़ी नोएल टाटा की नियुक्ति और उनके स्थायी ट्रस्टी के रूप में बने रहने से जुड़ी है। श्रीनिवासन की ओर से नोएल टाटा की नियुक्ति की जांच की मांग उठाई गई है। साथ ही यह सवाल भी उठाया गया है कि नोएल टाटा को टाटा ट्रस्ट का चेयरमैन बनाने का आधार क्या था और वह इस पद पर किस प्रक्रिया के तहत बने हुए हैं। इन सवालों ने ट्रस्ट की आंतरिक व्यवस्था और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर बहस तेज कर दी है।
मामला सिर्फ नियुक्ति तक सीमित नहीं है। एसडीटीटी से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण फैसलों में नोएल टाटा की भागीदारी और उनके मतदान अधिकारों पर भी रोक लगाने की मांग की गई है। इसमें टाटा संस के निदेशकों प्रतिनिधियों या प्रॉक्सी की नियुक्ति और उन्हें किसी तरह के निर्देश देने से जुड़े मामले भी शामिल हैं। ऐसे में विवाद का असर टाटा समूह की शीर्ष स्तर की निर्णय प्रक्रिया पर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
इस बीच सर रतन टाटा ट्रस्ट को लेकर भी पहले से स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं है। महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर की ओर से ट्रस्ट के कामकाज पर कुछ प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं। इन प्रतिबंधों के चलते ट्रस्ट फिलहाल बैठक नहीं कर पा रहा है। जब तक यह रोक नहीं हटती तब तक बैठक आयोजित करने में भी अड़चन बनी रहेगी।
टाटा ट्रस्ट की संरचना और टाटा संस में ट्रस्टों की भूमिका को देखते हुए यह विवाद काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ट्रस्टों के फैसलों का असर समूह की कंपनियों और उसके प्रशासनिक ढांचे पर भी पड़ सकता है। ऐसे में 84 कैविएट दाखिल होने के बाद अब निगाहें महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर की आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में यह साफ हो सकता है कि इन आपत्तियों और आरोपों पर क्या रुख अपनाया जाता है और नोएल टाटा तथा अन्य संबंधित पक्षों की भूमिका को लेकर विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।
