पूजा अर्चना के बाद विश्वप्रसन्न तीर्थ महाराज ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर का भ्रमण किया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने हरिनाम संकीर्तन किया। मृदंग झांझ और मजीरों की मंगल ध्वनि से पूरा परिसर भक्तिमय नजर आया। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के सचिव कपिल शर्मा ने उनका तुलसी माला पुष्पमाला और अंगवस्त्र से स्वागत किया। इसके बाद महाराजश्री ने श्रीभागवत भवन में भगवान श्रीकृष्ण भगवान श्रीराम और भगवान हयग्रीव के श्रीविग्रह के समक्ष भी पूजा की।
इस धार्मिक आयोजन की खास बात यह रही कि विश्वप्रसन्न तीर्थ महाराज अपने साथ जगद्गुरु माध्वाचार्य द्वारा पूजित करीब 800 वर्ष पुराने चल विग्रह भी लेकर आए थे। गर्भगृह में उन्होंने वैदिक परंपरा के अनुसार विधिवत पूजा की। तुलसी और पुष्प अर्पित करने के साथ विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और पूरे परिसर में धार्मिक वातावरण बना रहा।
पूजन के बाद विश्वप्रसन्न तीर्थ महाराज ने मथुरा में श्रीकृष्ण मंदिर निर्माण से जुड़े विषय पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि सनातन के पवित्र स्थलों पर बने पुराने ढांचों से करोड़ों सनातनियों की भावनाएं आहत हुई हैं। उन्होंने अयोध्या और काशी का उल्लेख करते हुए कहा कि अयोध्या में रामलला भव्य मंदिर में विराजमान हो चुके हैं जबकि काशी में बाबा विश्वनाथ मंदिर अपने आध्यात्मिक स्वरूप को प्राप्त कर रहा है। उनके अनुसार अब मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीला निश्चित करेंगे।
विश्वप्रसन्न तीर्थ महाराज ने इसे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनरोत्थान के दौर के रूप में बताया। उन्होंने कहा कि अन्याय और अत्याचार के प्रतीक हटेंगे तथा न्याय की बांसुरी बजेगी। उनका यह बयान श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर चल रही धार्मिक चर्चाओं के बीच सामने आया है। हालांकि मंदिर निर्माण और उससे जुड़े विवाद का अंतिम स्वरूप कानूनी और संबंधित संस्थागत प्रक्रियाओं से तय होना है।
श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर में महाराजश्री के आगमन के दौरान श्रद्धालुओं में भी खास उत्साह दिखाई दिया। हरिनाम संकीर्तन के बीच मृदंग झांझ और मजीरों की धुन से वातावरण भक्तिमय बना रहा। द्वैत वेदांत परंपरा से जुड़े विशेष पूजन और ब्रज की भावमय भक्ति के इस संगम ने कार्यक्रम को खास बना दिया। मथुरा की धार्मिक पहचान और श्रीकृष्ण जन्मभूमि की आस्था के बीच यह आयोजन श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व वाला रहा।
