डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के बीच सबसे बड़ा अंतर डिस्ट्रीब्यूटर से जुड़े खर्च का है। डायरेक्ट प्लान में डिस्ट्रीब्यूटर का कमीशन शामिल नहीं होता, इसलिए इसका एक्सपेंस रेशियो आमतौर पर रेगुलर प्लान से कम रहता है। रेगुलर प्लान में डिस्ट्रीब्यूटर से जुड़ा खर्च शामिल होने के कारण उसका एक्सपेंस रेशियो अधिक हो सकता है। इसी वजह से दोनों प्लान की एनएवी अलग-अलग होती है। लंबे समय तक निवेश करने पर खर्च में छोटा अंतर भी कंपाउंडिंग के कारण कुल निवेश राशि पर असर डाल सकता है। हालांकि, हर स्कीम में डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के खर्च का अंतर समान नहीं होता। इसलिए निवेश से पहले संबंधित स्कीम का वास्तविक टोटल एक्सपेंस रेशियो यानी TER देखना जरूरी है।
रेगुलर प्लान को केवल इसलिए खराब विकल्प नहीं माना जा सकता कि इसमें खर्च अधिक होता है। पहली बार म्यूचुअल फंड में निवेश करने वाले ऐसे लोगों के लिए यह उपयोगी हो सकता है, जिन्हें खुद स्कीम चुनने, जोखिम समझने या पोर्टफोलियो संभालने में परेशानी होती है। ऐसे निवेशकों को डिस्ट्रीब्यूटर या एजेंट से निवेश संबंधी मदद और मार्गदर्शन मिल सकता है। इस सुविधा की लागत निवेशक को अधिक एक्सपेंस रेशियो के रूप में चुकानी पड़ती है। इसलिए रेगुलर प्लान चुनने का मतलब केवल अधिक खर्च करना नहीं है, बल्कि इसके साथ मिलने वाली निवेश संबंधी सहायता को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
वहीं, डायरेक्ट प्लान उन निवेशकों के लिए उपयोगी हो सकता है जो अलग-अलग म्यूचुअल फंड की तुलना कर सकते हैं, जोखिम को समझते हैं और अपने निवेश की नियमित निगरानी के लिए समय निकाल सकते हैं। इसमें निवेशक को स्कीम चुनने से लेकर निवेश करने और पोर्टफोलियो पर नजर रखने तक की जिम्मेदारी खुद निभानी होती है। केवल इस आधार पर डायरेक्ट प्लान चुनना सही नहीं होगा कि इसमें रिटर्न अधिक दिखाई देता है। कम खर्च इसका एक प्रमुख लाभ है, लेकिन निवेश से जुड़े फैसले और उनकी जिम्मेदारी भी निवेशक की ही होती है।
इसलिए डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के बीच चुनाव केवल एक्सपेंस रेशियो देखकर नहीं करना चाहिए। निवेशक को अपनी जानकारी, जोखिम समझने की क्षमता और निवेश को संभालने के लिए उपलब्ध समय को भी ध्यान में रखना चाहिए। अगर निवेशक खुद रिसर्च करके फंड चुन सकता है और पोर्टफोलियो की निगरानी कर सकता है तो डायरेक्ट प्लान पर विचार किया जा सकता है। वहीं, निवेश के फैसलों में लगातार सहायता और मार्गदर्शन की जरूरत होने पर रेगुलर प्लान उपयोगी हो सकता है। दोनों विकल्पों में चुनाव निवेशक की अपनी जरूरत और निवेश संभालने की क्षमता के आधार पर किया जाना चाहिए।
