2015 में संसद ने युद्ध से दूर रहने का फैसला किया था
मार्च 2015 में सऊदी अरब ने पाकिस्तान से यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ अभियान के लिए लड़ाकू विमान, नौसैनिक जहाज और सैनिक उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था। इस मुद्दे पर पाकिस्तान की संसद में पांच दिन तक बहस हुई। 10 अप्रैल 2015 को संसद ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर यमन संघर्ष में पाकिस्तान को तटस्थ रखने का फैसला किया।
हालांकि, पाकिस्तान ने सऊदी अरब के समर्थन को स्पष्ट रखा था। संसद के प्रस्ताव में कहा गया था कि सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता या मक्का-मदीना के पवित्र स्थलों को खतरा होने की स्थिति में पाकिस्तान उसके साथ खड़ा रहेगा। उस समय पाकिस्तान ने संघर्ष का सैन्य हिस्सा बनने के बजाय राजनयिक भूमिका निभाने पर जोर दिया था।
11 साल बाद बदले हालात, लागू हुआ मक्का रक्षा समझौता
7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब के मक्का में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के मुताबिक, तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों पर हमले के तौर पर माना जाएगा और रक्षा सहयोग को मजबूत किया जाएगा।
यमन में हूतियों के हमले बढ़ने के बीच 5 अक्टूबर को रियाद में समझौते की रणनीतिक समिति की आपात बैठक हुई। इसके बाद तीनों देशों ने सामूहिक रक्षा प्रतिबद्धताओं को लागू करने और सऊदी अरब में आवश्यक सैन्य बलों तथा क्षमताओं की तेजी से तैनाती की दिशा में कदम उठाने पर सहमति जताई। हालांकि, कितने सैनिक भेजे जाएंगे और उनकी सटीक भूमिका क्या होगी, इसका पूरा विवरण अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है।
कागज पर बड़ी सैन्य ताकत, लेकिन यमन में चुनौती अलग
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये की संयुक्त सैन्य क्षमता हूतियों की तुलना में काफी बड़ी है। सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम हैं। पाकिस्तान बड़ी थल सेना और वायुसेना के साथ सैन्य अभियान का अनुभव रखता है। वहीं तुर्किये के पास ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसी क्षमताएं हैं।
लेकिन यमन का भूगोल किसी भी बड़ी सैन्य ताकत के लिए चुनौती पैदा करता है। उत्तरी यमन के पहाड़ी इलाके, गुफाएं और सुरंगें हूतियों को छिपकर हमला करने की क्षमता देते हैं। उनके पास मोबाइल मिसाइल लॉन्चर और अपेक्षाकृत बिखरी हुई सैन्य संरचना भी है। ऐसे में सिर्फ हवाई हमलों या बड़ी सैन्य ताकत के दम पर उन्हें पूरी तरह पराजित करना आसान नहीं होगा।
सऊदी अरब पहले भी लंबी लड़ाई में उलझ चुका है
सऊदी नेतृत्व वाला गठबंधन 2015 से यमन में सैन्य अभियान चलाता रहा है, लेकिन वह हूतियों को पूरी तरह खत्म नहीं कर सका। बाद के वर्षों में अमेरिका और ब्रिटेन ने भी हूती ठिकानों पर हमले किए, लेकिन संगठन की मिसाइल और ड्रोन क्षमता बनी रही।
मौजूदा संघर्ष में भी हूतियों ने सऊदी क्षेत्र और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता दिखाई है। 7 अक्टूबर को भी हूतियों ने मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जबकि सऊदी नेतृत्व वाली सेनाएं यमन में अपने अभियान को आगे बढ़ा रही हैं।
पाकिस्तान और तुर्किये की भूमिका निर्णायक हो सकती है, लेकिन…
विश्लेषण के मुताबिक, पाकिस्तान और तुर्किये सऊदी अरब की एयर डिफेंस, खुफिया जानकारी, निगरानी और सैन्य तकनीकी क्षमताओं को मजबूत कर सकते हैं। तुर्किये ने पहले ही कहा है कि वह सऊदी अरब की जरूरत के मुताबिक सैन्य तकनीकी सहायता देने के लिए तैयार है।
हालांकि, मौजूदा समझौते का सार्वजनिक स्वरूप मुख्य रूप से सऊदी अरब की रक्षा और सामूहिक प्रतिरोध क्षमता मजबूत करने पर केंद्रित है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान और तुर्किये यमन के अंदर सीधे जमीनी युद्ध या हूती ठिकानों के खिलाफ संयुक्त हमलों में किस स्तर तक शामिल होंगे। सितंबर में हुई सैन्य बैठकों के बाद भी उपलब्ध बयानों में संयुक्त जमीनी अभियान या सीधे हमलों की घोषणा नहीं हुई थी।
हूतियों को पूरी तरह हराना अब भी बड़ी चुनौती
सऊदी अरब को पाकिस्तान और तुर्किये का सैन्य सहयोग मिलने से उसकी रक्षा क्षमता और यमन में उसके समर्थित बलों को बढ़त मिल सकती है। तीनों देशों की संयुक्त ताकत हूतियों पर भारी दबाव डाल सकती है और उनके मिसाइल-ड्रोन हमलों से निपटने में मदद कर सकती है।
लेकिन सना और उत्तरी यमन के पहाड़ी इलाकों पर कब्जा कर हूतियों के संगठनात्मक और सैन्य ढांचे को पूरी तरह खत्म करना अलग चुनौती है। यमन की लंबी लड़ाई का अनुभव भी यही बताता है कि हवाई शक्ति और आधुनिक हथियारों के बावजूद हूतियों को निर्णायक रूप से समाप्त करना आसान नहीं रहा है। इसलिए पाकिस्तान और तुर्किये की भागीदारी सऊदी अरब की स्थिति मजबूत कर सकती है, लेकिन इससे हूतियों का पूरी तरह सफाया तय नहीं माना जा सकता।
