समिक भट्टाचार्य ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि राज्य का नाम ‘बंगाल’ या ‘वेस्ट बंगाल’ रखने के बजाय ‘पश्चिम बंग’ किया जाएगा। उनके मुताबिक, इस नाम का उद्देश्य राज्य को उसके इतिहास और पहचान से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि सरकार जल्द इस दिशा में विधायी प्रक्रिया शुरू करेगी।
वाराणसी में बनेगा ‘पश्चिम बंग भवन’
समिक भट्टाचार्य ने वाराणसी में ‘पश्चिम बंग भवन’ बनाने की योजना की भी जानकारी दी। उनके मुताबिक, यह भवन राज्य के संस्कृति और पर्यटन विभाग, केंद्र सरकार तथा कूचबिहार के पूर्व राजपरिवार के वंशजों के सहयोग से तैयार किया जाएगा।
यह भवन केवल सांस्कृतिक केंद्र के तौर पर ही नहीं, बल्कि बंगाल से वाराणसी आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए भी उपयोग किया जाएगा। प्रस्ताव में सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ अन्य सुविधाएं विकसित करने की बात कही गई है।
भाजपा नेता ने वाराणसी और बंगाल के बीच पुराने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कूचबिहार के राजपरिवार से जुड़े इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि राजपरिवार ने 1836 में बनारस कालीबाड़ी की आधारशिला रखी थी और इसके बाद वहां दो मंदिरों का निर्माण कराया गया था।
पहले भी कई बार उठा है नाम बदलने का मुद्दा
पश्चिम बंगाल का नाम बदलने का मुद्दा नया नहीं है। 1999 में ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने राज्य का नाम ‘पश्चिम बंग’ करने का प्रस्ताव विधानसभा में रखा था। बाद में ‘बांग्ला’ नाम को लेकर भी चर्चा हुई और प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया, लेकिन राजनीतिक सहमति और केंद्र की मंजूरी नहीं मिलने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद यह मुद्दा दोबारा उठा। ममता बनर्जी सरकार ने भी ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव रखा था। उस समय यह तर्क दिया गया था कि अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में राज्य का नाम काफी नीचे आने के कारण राष्ट्रीय बैठकों में पश्चिम बंगाल के प्रतिनिधियों को अपनी बारी के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। सर्वदलीय बैठक में प्रस्ताव का समर्थन भी हुआ, लेकिन केंद्र की मंजूरी नहीं मिली।
इसके बाद 2016 में नाम बदलने की प्रक्रिया फिर शुरू हुई। उस समय बंगाली में ‘बांग्ला’, अंग्रेजी में ‘बंगाल’ और हिंदी में ‘बंगाल’ नाम रखने का प्रस्ताव सामने आया। वर्ष 2018 में विधानसभा ने सर्वसम्मति से राज्य का नाम केवल ‘बांग्ला’ रखने का प्रस्ताव पारित किया था।
हालांकि, केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी। नाम परिवर्तन के लिए संवैधानिक प्रक्रिया का पालन जरूरी होने की बात सामने आई। साथ ही भाजपा के एक वर्ग ने ‘बांग्ला’ नाम की ‘बांग्लादेश’ से समानता को लेकर भी आपत्ति जताई थी।
अब आगे क्या होगा?
समिक भट्टाचार्य ने अब एक बार फिर ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव सामने रखा है। हालांकि, केवल राज्य विधानसभा में विधेयक पेश और पारित होने से नाम तुरंत नहीं बदलेगा। राज्य का नाम बदलने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे केंद्र और संसद की भूमिका भी होगी। मौजूदा रिपोर्टों के अनुसार, प्रस्ताव को विधानसभा स्तर से आगे बढ़कर केंद्र की प्रक्रिया और संसद की मंजूरी से गुजरना होगा। इसलिए फिलहाल पश्चिम बंगाल का आधिकारिक नाम ‘पश्चिम बंग’ नहीं हुआ है; यह नाम बदलने की प्रस्तावित प्रक्रिया का हिस्सा है।
