सरकार के अपने विमान की जरूरत उस समय ज्यादा महसूस हुई जब 6 मई 2021 को राज्य का बीचक्राफ्ट किंग एयर बी-200जीटी ग्वालियर एयरबेस पर क्रैश लैंडिंग का शिकार हो गया था। यह विमान करीब 65 करोड़ रुपये में खरीदा गया था लेकिन बीमा नहीं होने के कारण सरकार को नुकसान की भरपाई नहीं मिल सकी। अब इसे करीब 7 करोड़ रुपये की रिजर्व कीमत पर बेचने की प्रक्रिया चल रही है। इसके बाद से मुख्यमंत्री और दूसरे वीआईपी के लिए सरकार को निजी विमान किराए पर लेने पड़ रहे हैं।
विधानसभा में उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2021 से नवंबर 2025 के बीच विमान और हेलिकॉप्टर किराए पर करीब 290 करोड़ रुपये खर्च हुए। 2025 में नवंबर तक ही यह खर्च 90 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच गया था। विमानन विभाग का तर्क है कि लगातार बढ़ रहे किराये के खर्च को कम करने के लिए अपना जेट खरीदना जरूरी है। हालांकि जेट खरीदने के बाद भी सरकार को इसके संचालन पर हर साल बड़ी रकम खर्च करनी होगी।
चैलेंजर 3500 की खरीद को लेकर अलग अलग समय पर अलग कीमतें सामने आई हैं। वर्ष 2022 में सरकार करीब 120 करोड़ रुपये के जेट पर विचार कर रही थी। बाद में कीमत और डिलीवरी से जुड़े कारणों से प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। मार्च 2024 में नए टेंडर में बॉम्बार्डियर और एम्ब्रेयर ने हिस्सा लिया। जुलाई 2024 में कैबिनेट ने बॉम्बार्डियर चैलेंजर 3500 खरीदने की मंजूरी दी और उस समय कीमत करीब 233 करोड़ रुपये बताई गई। अब टैक्स ट्रांसपोर्ट और अन्य खर्च जोड़ने के बाद कुल अनुमान करीब 350 करोड़ रुपये बताया जा रहा है।
सिर्फ खरीद कीमत ही पूरी तस्वीर नहीं है। विमान को चलाने में क्रू हैंगर बीमा मेंटेनेंस और ईंधन समेत कई खर्च होते हैं। अनुमान के मुताबिक 450 घंटे सालाना उड़ान पर इसका कुल खर्च करीब 30 से 33 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। यानी प्रति उड़ान घंटे लागत किराए के विमान की तुलना में ज्यादा भी हो सकती है। हालांकि यदि किराए के विमान पर लगने वाला स्टैंडिंग चार्ज पूरी तरह समाप्त हो जाता है तो सरकार के कुल खर्च में कुछ राहत मिल सकती है।
जेट के साथ सरकार ने एयरबस ACH160 हेलिकॉप्टर भी खरीदा है। हेलिकॉप्टर की कीमत करीब 150 करोड़ रुपये बताई गई थी जबकि टैक्स और अन्य शुल्क जोड़ने पर खर्च करीब 225 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। इस तरह जेट और हेलिकॉप्टर के बाद हवाई ढांचे को तैयार करने का खर्च भी सरकार के सामने है।
चैलेंजर 3500 को चलाने के लिए सरकार को पायलटों की ट्रेनिंग और जरूरी प्रमाणन प्रक्रिया पूरी करनी होगी। विदेश में प्रशिक्षण लेने गए प्रदेश के दो पायलट पहली कोशिश में टेस्ट पास नहीं कर सके। फिलहाल उन्हें को पायलट का प्रमाणपत्र मिला है। इसलिए शुरुआत में बॉम्बार्डियर का एक प्रशिक्षित पायलट विमान उड़ाएगा। सरकारी पायलटों को उसके साथ निर्धारित उड़ान अनुभव पूरा करने के बाद स्वतंत्र रूप से जेट उड़ाने की अनुमति मिल सकेगी।
सबसे बड़ी चुनौती रनवे को लेकर है। विभाग के आकलन के अनुसार जेट के लिए कम से कम करीब 1800 मीटर और बेहतर संचालन के लिए लगभग 2100 मीटर लंबा रनवे जरूरी माना जा रहा है। प्रदेश के सभी एयरपोर्ट और हवाई पट्टियां इस जरूरत को पूरा नहीं करतीं। मौजूदा आकलन के अनुसार करीब 10 स्थानों पर यह जेट उतर सकता है। इनमें भोपाल इंदौर ग्वालियर जबलपुर खजुराहो रीवा और दतिया के एयरपोर्ट के अलावा मंदसौर सिवनी और मंडला की हवाई पट्टियां शामिल हैं।
सरकार कई अन्य हवाई पट्टियों के विस्तार की तैयारी भी कर रही है। इसके लिए जिलों से जमीन की जानकारी मांगी गई है। सरकारी जमीन मिलने पर एक पट्टी के विस्तार में करीब 10 से 15 करोड़ रुपये जबकि निजी जमीन अधिग्रहण की स्थिति में 30 से 40 करोड़ रुपये तक खर्च होने का अनुमान है। कुल मिलाकर हवाई पट्टियों के विस्तार पर करीब 300 से 400 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं।
ऐसे में जेट हेलिकॉप्टर और रनवे विस्तार को जोड़कर पूरी योजना का अनुमानित खर्च करीब 875 से 975 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इसमें हेलिपैड नेटवर्क का खर्च शामिल नहीं है। इसलिए सरकार के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अपना जेट खरीदने से किराए का खर्च कितना बचेगा बल्कि यह भी है कि विमान को प्रभावी तरीके से चलाने के लिए अगले कई वर्षों में कितना अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा। अंतिम फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार जेट का कितना नियमित इस्तेमाल करती है और मौजूदा किराये तथा स्टैंडिंग चार्ज में वास्तविक रूप से कितनी कमी आती है।
