मल्होत्रा ने कहा कि एआई क्षेत्र में ऐसी गिरावट वैश्विक बाजारों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है, लेकिन इसका भारत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। उन्होंने कहा कि अगर विकसित देशों में एआई से जुड़े वैल्यूएशन में सुधार होता है, तो इससे भारत की ओर पूंजी प्रवाह पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। उनके मुताबिक, हाल के महीनों में भारतीय इक्विटी बाजार में भी ऊंचे वैल्यूएशन से सुधार हुआ है और इसे बाजार की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए।
आरबीआई गवर्नर ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली के सामने मौजूद कई अन्य जोखिमों का भी उल्लेख किया। इनमें वैश्विक स्तर पर बढ़ा हुआ कर्ज, नॉन-बैंक फाइनेंशियल सेक्टर में लीवरेज, प्राइवेट क्रेडिट एक्सपोजर में वृद्धि और साइबर सुरक्षा से जुड़े खतरे शामिल हैं। उन्होंने हालांकि स्पष्ट किया कि इन कमजोरियों का होना तत्काल किसी वित्तीय संकट की शुरुआत का संकेत नहीं है। उनके अनुसार, इन जोखिमों को लेकर सतर्क रहना जरूरी है, भले ही फिलहाल संकट के तत्काल संकेत दिखाई नहीं दे रहे हों।
मल्होत्रा ने कहा कि भारत मजबूत व्यापक आर्थिक आधार और बैंकों तथा नॉन-बैंक फाइनेंशियल संस्थानों की मजबूत बैलेंस शीट के सहारे चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल का सामना कर रहा है। उन्होंने यह भी माना कि कमोडिटी की कीमतों, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों और पूंजी प्रवाह में बदलाव के कारण भारत बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। इसके बावजूद उन्होंने घरेलू वित्तीय प्रणाली की मजबूती को रेखांकित किया और कहा कि वित्तीय क्षेत्र में मजबूती बनी हुई है।
आरबीआई गवर्नर के बयान में एआई निवेश से जुड़े वैश्विक घटनाक्रम और भारत में संभावित पूंजी प्रवाह के बीच संबंध पर जोर दिया गया। उनके मुताबिक, विकसित अर्थव्यवस्थाओं में एआई से जुड़े वैल्यूएशन में सुधार भारत के लिए पूंजी आकर्षित करने का अवसर बन सकता है। दूसरी ओर, वैश्विक कर्ज, वित्तीय संस्थानों में बढ़ता लीवरेज, निजी ऋण का बढ़ता एक्सपोजर और साइबर सुरक्षा जैसे जोखिमों पर नजर रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत की घरेलू वित्तीय प्रणाली मजबूत बनी हुई है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव के कारण सतर्कता आवश्यक है।
