दरअसल, द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव और चुनावी डेटा के केंद्रीकरण से जुड़े मुद्दे शामिल थे।
अखिलेश बोले- यूपी चुनाव की निगरानी पर उठ रहे सवाल
अखिलेश यादव ने कहा कि जब आयोग के भीतर ही फैसलों को लेकर आपत्तियां दर्ज की जा रही हैं तो आगामी यूपी विधानसभा चुनाव की निगरानी को लेकर भी सवाल उठते हैं। उन्होंने कहा कि 2027 का विधानसभा चुनाव ऐसे माहौल में नहीं होना चाहिए, जहां चुनाव आयोग की भूमिका पर ही राजनीतिक दल सवाल उठा रहे हों।
उन्होंने 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव का भी जिक्र किया। अखिलेश का आरोप है कि जिन इलाकों में समाजवादी पार्टी के समर्थक मतदाता थे, वहां वोटर लिस्ट से नाम हटाए गए। उन्होंने कहा कि पार्टी ने इस संबंध में एफिडेविट के साथ शिकायत भी की थी, लेकिन किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई।
उपचुनावों को लेकर भी लगाए आरोप
सपा अध्यक्ष ने यूपी में हुए उपचुनावों का जिक्र करते हुए भी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि इन चुनावों के दौरान भी उनकी पार्टी ने अनियमितताओं की शिकायत की थी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।
अखिलेश ने दावा किया कि कुछ लोगों के हस्ताक्षर तक बनाए गए और उनके आधार पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटे गए। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी गंभीर शिकायतों के बावजूद किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
‘सत्ता की कठपुतली बनकर काम कर रहा आयोग’
अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग पर सत्ता के प्रभाव में काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग सत्ता की कठपुतली बनकर काम कर रहे हैं, ताकि सत्ता में बैठे लोगों का प्रभाव बना रहे। उनके मुताबिक, यह स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है और आने वाले समय में जनता भी इसका जवाब देगी। अखिलेश ने कहा कि यूपी के चुनाव और उपचुनाव में पार्टी ने जिन मुद्दों को उठाया, उन पर शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई।
आयोग ने रिपोर्ट पर दिया अलग पक्ष
इस पूरे विवाद के बीच चुनाव आयोग के सूत्रों ने द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सामने आए मतभेद के दावे को खारिज किया है। आयोग के सूत्रों के मुताबिक, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) समेत सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
वहीं, रिपोर्ट में चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने तथा मतदाता डेटा के प्रबंधन से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया गया है। ऐसे में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
