अब राज्यसभा में भी BSP का प्रतिनिधित्व खत्म होने की स्थिति बन रही है। पार्टी के मौजूदा इकलौते राज्यसभा सांसद रामजी गौतम का कार्यकाल नवंबर में पूरा होना है। इसके बाद BSP के पास संसद के दोनों सदनों में कोई निर्वाचित सांसद नहीं रहेगा। उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी के पास राज्यसभा चुनाव के लिए पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण तत्काल वापसी की संभावना भी सीमित है।
यह स्थिति BSP के राजनीतिक सफर में महत्वपूर्ण बदलाव को दिखाती है। पार्टी की स्थापना 1984 में कांशीराम ने की थी और बाद में मायावती ने इसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में स्थापित किया। 2007 के विधानसभा चुनाव में BSP ने उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। इसके बाद पार्टी का विधानसभा में प्रदर्शन लगातार कमजोर होता गया। 2012 में उसकी सीटें घटकर 80 रह गईं। 2017 में BSP 19 सीटों पर सिमट गई और 2022 में केवल एक सीट जीत सकी। वह एकमात्र सीट रसड़ा थी जहां से उमाशंकर सिंह निर्वाचित हुए थे। उनके निधन के बाद विधानसभा में BSP का खाता खाली हो गया।
लोकसभा चुनावों में भी पार्टी को लगातार चुनौती मिली है। 2009 के लोकसभा चुनाव में BSP ने 21 सीटें जीती थीं। लेकिन 2014 में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। 2019 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल के साथ गठबंधन में BSP ने 10 सीटें जीतीं। 2024 में पार्टी फिर कोई लोकसभा सीट नहीं जीत सकी। इस तरह राष्ट्रीय स्तर पर BSP का संसदीय प्रतिनिधित्व लगातार कमजोर हुआ है।
अब चर्चा पार्टी के राष्ट्रीय दर्जे को लेकर भी हो रही है। चुनाव आयोग के उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार BSP अभी राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त दलों में शामिल है। आयोग की मौजूदा सूची में BSP को राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर दर्ज किया गया है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि उसका राष्ट्रीय दर्जा अभी खत्म हो गया है। हालांकि भविष्य में चुनावी प्रदर्शन के आधार पर मान्यता की समीक्षा महत्वपूर्ण हो सकती है।
चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता के लिए अलग अलग रास्ते तय हैं। इनमें किसी पार्टी का कम से कम चार राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनाव में छह प्रतिशत वैध वोट हासिल करना और कम से कम चार लोकसभा सदस्य चुनकर लाना शामिल है। दूसरा रास्ता लोकसभा की कुल सीटों के कम से कम दो प्रतिशत पर जीत हासिल करना है और ये सांसद कम से कम तीन राज्यों से होने चाहिए। इसके अलावा किसी दल का कम से कम चार राज्यों में राज्य पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त होना भी राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता का एक आधार है।
BSP के लिए आने वाला समय इसलिए अहम है क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। पार्टी को जहां अपने संगठन और चुनावी आधार को मजबूत करने की चुनौती है वहीं राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखना भी उसके लिए महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल राष्ट्रीय दर्जा खत्म होना कोई घोषित फैसला नहीं है लेकिन संसद और विधानसभा में प्रतिनिधित्व खत्म होने की स्थिति ने BSP की राजनीतिक स्थिति को लेकर चर्चा जरूर बढ़ा दी है।
