नई दिल्ली । किसानों को नकली और घटिया गुणवत्ता वाले बीजों से बचाने के लिए केंद्र सरकार नया बीज अधिनियम लाने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित कानून के जरिए करीब 60 साल पुराने मौजूदा कानूनी ढांचे में बदलाव किया जाएगा। सरकार का उद्देश्य बीजों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने, कारोबार में पारदर्शिता बढ़ाने और नकली बीजों के कारोबार पर प्रभावी कार्रवाई के लिए मजबूत व्यवस्था तैयार करना है।
प्रस्तावित कानून में बीज से जुड़े उल्लंघनों को तीन श्रेणियों में बांटने की योजना है। मामूली उल्लंघन करने वालों के लिए पहली बार चेतावनी और दोबारा उल्लंघन पर जुर्माने का प्रावधान प्रस्तावित है। जानबूझकर किए गए उल्लंघनों में बीज के पैकेट पर QR कोड नहीं लगाना, जरूरी जानकारी उपलब्ध नहीं कराना और गलत ब्रांडिंग जैसे मामले शामिल किए जाने का प्रस्ताव है।
ऐसे मामलों में आर्थिक दंड का प्रावधान भी रखा गया है। उपलब्ध प्रस्ताव के अनुसार, कुछ उल्लंघनों के लिए पहली बार 1 लाख रुपये और दूसरी बार 2 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। वहीं गंभीर अपराधों को तीसरी श्रेणी में रखा गया है। इसमें नकली बीज बेचना, बिना पंजीकरण कारोबार करना और जानबूझकर धोखाधड़ी जैसे मामले शामिल हैं। गंभीर उल्लंघनों के लिए 30 लाख रुपये तक का जुर्माना और जेल की सजा का प्रस्ताव है।
प्रस्तावित कानून के तहत सभी बीज और रोपण सामग्री का राष्ट्रीय रजिस्टर में पंजीकरण अनिवार्य किया जाएगा। बिना पंजीकरण वाले बीजों को अवैध माना जाएगा और उन्हें बाजार में बेचने की अनुमति नहीं होगी। प्रत्येक बीज पैकेट पर QR कोड लगाने का भी प्रस्ताव है। इसके जरिए किसान बीज की उत्पत्ति, निर्माता, प्रयोगशाला से मिली मंजूरी और आपूर्ति श्रृंखला में उसकी आवाजाही से जुड़ी जानकारी हासिल कर सकेंगे।
सरकार का तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था में लगभग 70 प्रतिशत बीज कानून के दायरे से बाहर हैं। अलग-अलग राज्यों में बीजों से जुड़ी प्रक्रियाएं भी अलग हैं और मौजूदा कानून में दंड के प्रावधान पर्याप्त नहीं माने जा रहे हैं। इसी वजह से नकली और खराब गुणवत्ता वाले बीजों के खिलाफ अधिक प्रभावी कार्रवाई के लिए नए कानून की जरूरत बताई गई है।
प्रस्तावित कानून में किसानों के पारंपरिक बीज अधिकार सुरक्षित रखने की बात कही गई है। किसान पारंपरिक और किसान किस्म के बीजों का इस्तेमाल, आदान-प्रदान और बिक्री पहले की तरह कर सकेंगे। ऐसे पारंपरिक बीजों का पंजीकरण अनिवार्य नहीं होगा। व्यक्तिगत उपयोग, गांव में वितरण या किसी कंपनी के लिए बीज तैयार करने वाले किसानों के लिए डिजिटल पंजीकरण भी जरूरी नहीं होगा।
नए कानून में ट्रेसबिलिटी को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य बीज फेल होने की स्थिति में जिम्मेदारी तय करना है। सभी बीज किस्मों को एकीकृत राष्ट्रीय ऑनलाइन रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा। राज्य सरकारों को राज्य स्तरीय समितियों की सिफारिश के आधार पर नई बीज किस्में जारी करने का अधिकार देने का भी प्रस्ताव है।
किसानों के नुकसान की स्थिति में प्रत्येक राज्य में सीड सिक्योरिटी फंड बनाने का प्रावधान प्रस्तावित है। बीज फेल होने पर सत्यापन समिति जांच करेगी और किसान को 15 दिनों के भीतर मुआवजा देने की व्यवस्था का प्रस्ताव है।
मौजूदा बीज अधिनियम 1966 में बनाया गया था, जबकि बीज नियंत्रण आदेश 1983 में लागू हुआ था। सरकार ने प्रस्तावित नए कानून पर पिछले साल सुझाव मांगे थे और करीब 18,000 सुझाव प्राप्त हुए। 10 सितंबर को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने 20 किसान संगठनों के साथ परामर्श किया। सरकार के अनुसार, प्रस्तावित सीड बिल संसद के शीतकालीन सत्र में लाया जा सकता है।
