सबसे बड़ा सवाल तकनीक की समयसीमा को लेकर है। चैटजीपीटी नवंबर 2022 में सार्वजनिक रूप से लॉन्च हुआ जबकि गूगल का बार्ड 2023 में भारत आया जिसे अब जेमिनी के नाम से जाना जाता है। ऐसे में टेंडर में एआई आधारित ग्रेन एनालाइजर के लिए पांच साल के अनुभव की शर्त ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार कुछ कंपनियों ने 2014 से 2021 के बीच सप्लाई किए गए एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर ग्रेन फिजिकल एनालाइजर ऑटोमेटिक ग्रेन एनालाइजर और ग्रेन ग्रेडिंग डिवाइस के रिकॉर्ड को अनुभव के तौर पर पेश किया। सवाल यह है कि क्या इन पुराने उपकरणों में वही एआई तकनीक मौजूद थी जिसकी मांग मौजूदा टेंडर में की गई है और अगर थी तो उसे साबित करने वाले तकनीकी दस्तावेज क्या हैं।
दस्तावेजों में अमलिका मर्केन्टाइल की ओर से ओईएम नेबुला इनोवेशन का अनुभव प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख है। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक नेबुला इनोवेशन ने जनवरी और सितंबर 2023 में एफसीआई को कुल 400 एआई बेस्ड एनालाइजर सप्लाई किए थे। इसके बाद नवंबर 2024 में ओडिशा मंडी बोर्ड को 248 एआई बेस्ड एनालाइजर की सप्लाई का रिकॉर्ड बताया गया है। वहीं पुराने रिकॉर्ड में 2020 में राजस्थान मंडी बोर्ड को 136 ग्रेन फिजिकल एनालाइजर और हरियाणा मंडी बोर्ड को 54 ऑटोमेटिक ग्रेन एनालाइजर की सप्लाई का उल्लेख है। 2021 में गुजरात के डायरेक्टोरेट ऑफ फॉरेंसिक साइंस को एक ग्रेन ग्रेडिंग डिवाइस दिए जाने का रिकॉर्ड भी अनुभव में शामिल किया गया।
इसी तरह फर्टिस इंडिया की ओर से भी नेबुला इनोवेशन के अनुभव प्रमाण प्रस्तुत किए गए। दूसरी कंपनी एयरपे पेमेंट सर्विसेस ने ओईएम ज्यूटैक ओप्टो इलेक्ट्रॉनिक का अनुभव लगाया। इसमें 2014 में फिक्की रिसर्च एंड एनालिसिस सेंटर को एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर सप्लाई करने के अलावा 2018 में पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और 2020 में मदुरा कोट्स तथा महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ को उपकरण उपलब्ध कराने के दस्तावेज बताए गए हैं।
टेंडर प्रक्रिया में एक और महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है। शुरुआत में अनुभव की शर्त निविदाकर्ता के लिए रखी गई थी लेकिन बाद में इसमें संशोधन कर ओईएम के अनुभव को भी शामिल कर लिया गया। इस पूरी प्रक्रिया में सात बार संशोधन किए जाने की बात सामने आई है। यही बदलाव अब टेंडर की पारदर्शिता और पात्रता के मानकों को लेकर चर्चा का कारण बन रहे हैं।
मामले में असली सवाल यह नहीं है कि पुराने उपकरणों को अनुभव माना गया या नहीं बल्कि यह है कि जिस तकनीक के आधार पर आज की मशीनों की क्षमता तय की जा रही है क्या वही तकनीकी विशेषताएं पुराने उपकरणों में भी मौजूद थीं। अगर पुराने एनआईआर स्पेक्ट्रोफोटोमीटर या पारंपरिक ग्रेन एनालाइजर को एआई बेस्ड फूड ग्रेन एनालाइजर के अनुभव के बराबर माना गया है तो उसके तकनीकी आधार और प्रमाण क्या हैं यह स्पष्ट होना जरूरी है।
क्योंकि मामला केवल टेंडर में कंपनियों के चयन तक सीमित नहीं है। हजारों मशीनों को सात साल की लंबी अवधि के लिए किराए पर लेने की योजना है और इनका इस्तेमाल किसानों से खरीदे जाने वाले खाद्यान्न की गुणवत्ता जांचने में किया जाना है। ऐसे में मशीनों की तकनीकी क्षमता उनकी सटीकता और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता सीधे तौर पर सार्वजनिक हित से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि टेंडर में अनुभव की शर्त पुराने उपकरणों के रिकॉर्ड और सात बार किए गए संशोधनों को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।
अब निगाह इस बात पर है कि कॉरपोरेशन इन सवालों पर क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या यह साफ करता है कि जिन कंपनियों को तकनीकी रूप से योग्य माना गया उनके अनुभव में वास्तव में एआई आधारित तकनीक मौजूद थी या पुराने उपकरणों को नए एआई सिस्टम के अनुभव के रूप में स्वीकार किया गया। जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पूरी प्रक्रिया तकनीकी जरूरत के मुताबिक हुई है या टेंडर की शर्तों में हुए बदलावों ने पात्रता का दायरा बदल दिया।
