चांद पर जमीन खरीदने के दावे लंबे समय से सामने आते रहे हैं। कई लोग जन्मदिन, शादी या अन्य खास मौकों पर चांद की जमीन उपहार में देने की बात कहते हैं। कुछ संस्थाएं चांद की जमीन के नाम पर प्रमाणपत्र और दस्तावेज भी बेचती हैं। हालांकि इन दस्तावेजों से चांद की जमीन पर वास्तविक कानूनी मालिकाना हक हासिल नहीं होता।
चांद और दूसरे खगोलीय पिंडों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों का प्रमुख आधार 1967 की अंतरिक्ष संधि है। इस संधि में भारत और अमेरिका समेत 114 देश शामिल हैं। संधि के अनुसार बाहरी अंतरिक्ष की खोज और उसका इस्तेमाल सभी देशों के लाभ और हित में होना चाहिए। चांद और दूसरे खगोलीय पिंड भी इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं।
संधि का अनुच्छेद 2 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार बाहरी अंतरिक्ष, जिसमें चांद और अन्य खगोलीय पिंड शामिल हैं, किसी देश के राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र में नहीं आ सकते। कोई देश संप्रभुता, कब्जे या किसी अन्य तरीके से चांद के किसी हिस्से को अपना राष्ट्रीय क्षेत्र घोषित नहीं कर सकता। इसलिए किसी देश का चांद पर राष्ट्रीय स्वामित्व का दावा अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप नहीं है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि देश चांद पर मिशन नहीं भेज सकते। अंतरिक्ष संधि सभी देशों को अंतरिक्ष और खगोलीय पिंडों की खोज तथा इस्तेमाल की स्वतंत्रता देती है। वैज्ञानिक अनुसंधान भी किया जा सकता है, लेकिन अंतरिक्ष गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और सहयोग के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।
चांद पर पहुंचने वाले यान और उपकरणों को लेकर भी संधि में अलग व्यवस्था है। अनुच्छेद 8 के अनुसार किसी देश के पंजीकरण में दर्ज अंतरिक्ष वस्तु पर उस देश का अधिकार और नियंत्रण बना रहता है। चांद पर उतरने के बाद भी किसी यान या उपकरण का स्वामित्व केवल इसलिए खत्म नहीं होता कि वह खगोलीय पिंड पर मौजूद है। लेकिन इससे चांद की जमीन पर उस देश का मालिकाना हक नहीं बनता।
निजी कंपनियों के लिए भी नियम स्पष्ट हैं। अनुच्छेद 6 के तहत सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं की अंतरिक्ष गतिविधियों की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी संबंधित देश की होती है। निजी संस्थाओं को अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए संबंधित देश की अनुमति और लगातार निगरानी व्यवस्था के तहत काम करना होता है।
चांद पर जमीन बेचने के दावे भी कई दशकों से होते रहे हैं। जर्मनी के नागरिक मार्टिन जुर्गेंस ने चांद को अपने परिवार की संपत्ति बताया था। बाद में अमेरिकी कारोबारी डेनिस होप ने लूनर एंबेसी नाम की संस्था के जरिए चांद की जमीन बेचने का दावा किया और लोगों को प्रमाणपत्र देने शुरू किए।
ऐसे प्रमाणपत्र कुछ लोग मनोरंजन, कल्पना या उपहार के तौर पर खरीदते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून में निजी व्यक्तियों या कंपनियों के लिए चांद की जमीन के मालिकाना हक का कोई मान्य पंजीकरण तंत्र नहीं है। इसलिए इन प्रमाणपत्रों को कानूनी संपत्ति अधिकार नहीं माना जाता।
चांद पर गतिविधियों से होने वाले नुकसान को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय नियम मौजूद हैं। अनुच्छेद 7 के अनुसार अंतरिक्ष वस्तुओं से दूसरे देशों या उनके लोगों को नुकसान होने की स्थिति में लॉन्च करने वाले देश की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी बन सकती है। अनुच्छेद 9 देशों को ऐसी गतिविधियों से बचने और दूसरे देशों के हितों का ध्यान रखने की बात कहता है।
चांद तक पहुंचने में सोवियत संघ, अमेरिका, जापान, यूरोप, भारत और चीन समेत कई देशों ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। भारत के चंद्रयान-1 और चंद्रयान-3 जैसे मिशनों ने चंद्रमा के अध्ययन में योगदान दिया है। अमेरिका के अपोलो मिशनों ने इंसानों को चांद की सतह तक पहुंचाया, जबकि हाल के वर्षों में सरकारी और निजी मिशनों की गतिविधियां भी बढ़ी हैं।
इसलिए चांद पर यान भेजना, वैज्ञानिक उपकरण स्थापित करना या शोध करना और चांद की जमीन का मालिक बनना अलग-अलग बातें हैं। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय नियम किसी देश को चांद पर संप्रभुता स्थापित करने की अनुमति नहीं देते और जमीन खरीदने के प्रमाणपत्र भी वास्तविक कानूनी मालिकाना हक प्रदान नहीं करते।
