श्रीनाथ ने 1991 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा। शुरुआती दौर में उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी तेज गति थी लेकिन करियर के दौरान उन्होंने अपनी गेंदबाजी में स्विंग और धीमी गेंद जैसे हथियार भी जोड़े। 1997 में चोट ने उनके करियर को बड़ा झटका दिया और उन्हें लगभग पूरा साल क्रिकेट से बाहर रहना पड़ा। उस समय उनकी वापसी को लेकर सवाल उठने लगे थे लेकिन श्रीनाथ ने हार नहीं मानी। वापसी के बाद उन्होंने अपनी गेंदबाजी में बदलाव किया और 1998 उनके करियर के सबसे शानदार वर्षों में शामिल हो गया। चोट के बाद उनकी गति कुछ प्रभावित हुई लेकिन विकेट लेने की क्षमता और गेंदबाजी की समझ और मजबूत होती गई।
1999 वनडे विश्व कप में पाकिस्तान के खिलाफ श्रीनाथ ने 154.5 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गेंद फेंककर अपनी गति का जबरदस्त प्रदर्शन किया। लंबे समय तक यह वनडे क्रिकेट में किसी भारतीय गेंदबाज द्वारा फेंकी गई सबसे तेज गेंद का रिकॉर्ड रहा। बाद में 2023 में उमरान मलिक ने श्रीलंका के खिलाफ 156 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गेंद डालकर यह रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। इसके बावजूद श्रीनाथ की तेज गेंदबाजी भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक खास मुकाम रखती है।
श्रीनाथ ने भारत की ओर से चार वनडे विश्व कप खेले। 1992 1996 1999 और 2003 में वह भारतीय टीम का हिस्सा रहे। 2003 विश्व कप से पहले उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने का फैसला किया था लेकिन तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली ने उन्हें वापसी के लिए तैयार किया। श्रीनाथ ने भी कप्तान के भरोसे को सही साबित किया और 2003 विश्व कप में शानदार गेंदबाजी करते हुए 11 मैचों में 16 विकेट हासिल किए। इस प्रदर्शन ने भारत को फाइनल तक पहुंचाने में उनकी अहम भूमिका निभाई।
2002 में भी श्रीनाथ उस भारतीय टीम का हिस्सा थे जिसने श्रीलंका के साथ संयुक्त रूप से आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी का खिताब जीता था। इसके बाद 2003 विश्व कप के बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया। उनके आंकड़े उनकी महानता की गवाही देते हैं। श्रीनाथ ने भारत के लिए 229 वनडे मैचों में 315 विकेट हासिल किए और वह वनडे क्रिकेट में भारत के सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले तेज गेंदबाज हैं। कुल भारतीय गेंदबाजों में केवल अनिल कुंबले उनसे आगे हैं। वह 300 से ज्यादा वनडे विकेट लेने वाले भारत के एकमात्र तेज गेंदबाज भी रहे हैं।
टेस्ट क्रिकेट में भी श्रीनाथ का प्रदर्शन शानदार रहा। उन्होंने 67 टेस्ट मैचों में 236 विकेट अपने नाम किए। करीब 12 साल लंबे अंतरराष्ट्रीय करियर में उन्होंने भारतीय तेज गेंदबाजी को लगातार मजबूती दी और कई मुश्किल विदेशी दौरों पर टीम की गेंदबाजी की अगुआई की।
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद श्रीनाथ ने कमेंट्री या कोचिंग को अपना मुख्य पेशा बनाने के बजाय मैच रेफरी के रूप में नई पारी शुरू की। वह आईसीसी के प्रतिष्ठित मैच रेफरी के रूप में लंबे समय से अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। क्रिकेट में उनके योगदान के लिए 1999 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। तेज गति स्विंग अनुभव और लगातार प्रदर्शन की बदौलत जवागल श्रीनाथ भारतीय क्रिकेट में उस दौर के प्रतीक बन गए जब एक अकेला तेज गेंदबाज पूरी गेंदबाजी इकाई की पहचान बन सकता था।
