उल्लेखनीय है कि संबंधित न्यायाधीश ने महज 129 दिनों के अल्प समय में 9 अत्यंत चर्चित और जघन्य आपराधिक मामलों की सुनवाई पूरी करते हुए कुल 22 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है। लगातार कठोर फैसले सुनाए जाने के कारण उनकी सुरक्षा व्यवस्था बेहद संवेदनशील मानी जा रही थी। ऐसे में सुरक्षा घेरे में अचानक किए गए बदलाव ने न्यायिक हलकों और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।
डीजीपी को भेजे गए पत्र में न्यायाधीश ने स्पष्ट किया है कि उनकी सुरक्षा में तैनात गनर को बिना किसी ठोस वजह और बिना उनकी पूर्व अनुमति के अचानक हटा दिया गया। पत्र के अनुसार प्रतिसार निरीक्षक द्वारा लिया गया यह निर्णय प्रशासनिक व्यवस्था में गंभीर प्रोटोकॉल उल्लंघन की श्रेणी में आता है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि गनर को हटाए जाने के तुरंत बाद संबंधित पुलिसकर्मी ने भी बिना कोई सूचना दिए अपनी ड्यूटी छोड़ दी।
न्यायाधीश ने अपने पत्र में प्रशासनिक अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों के बीच सुरक्षा प्रोटोकॉल में किए जाने वाले भेदभाव की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने उल्लेख किया कि आमतौर पर जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या अन्य उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के गनरों को उनकी सहमति या जानकारी के बिना नहीं बदला जाता, लेकिन संवेदनशील न्यायिक पदों पर आसीन अधिकारियों के मामले में इस निर्धारित प्रक्रिया का अनदेखा किया जा रहा है।
यह मामला केवल मुजफ्फरनगर तक सीमित न होकर पूरे देश के न्यायिक वर्ग की सुरक्षा से जुड़ा हुआ विषय बन गया है। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में भी गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई करने वाले न्यायाधीशों की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए जाते रहे हैं। सुरक्षा में इस प्रकार की चूक न्यायिक कार्यों के निष्पक्ष और निडर संपादन में बड़ी बाधा बन सकती है।
पत्र के माध्यम से मांग की गई है कि इस पूरे प्रकरण की जांच कराई जाए और दोषी पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। इसके साथ ही न्यायाधीश की सुरक्षा व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से कड़ा करने और पूर्ववत प्रोटोकॉल को बहाल करने का आग्रह किया गया है, ताकि संवेदनशील मुकदमों की सुनवाई निर्भीक वातावरण में जारी रह सके।
