ईरान के वरिष्ठ सांसद होसैनअली हाजीदेलिगानी ने कहा है कि विदेश मंत्री अब्बास अराघची के खिलाफ महाभियोग लाने के लिए आवश्यक दस्तावेज और सबूत जुटाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि उचित समय आने पर संसद में यह प्रक्रिया शुरू की जाएगी। सांसदों का आरोप है कि अमेरिका के साथ युद्धविराम के दौरान हुई बातचीत ने ईरान के राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाया और भविष्य में ऐसे समझौते देश की संप्रभुता के लिए खतरा बन सकते हैं।
इसी बीच इजराइली मीडिया की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि राष्ट्रपति मसूद पजशकियान की शक्तियां सीमित कर दी गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा परमाणु कार्यक्रम और अमेरिका से जुड़ी रणनीतिक बातचीत जैसे अहम मामलों में अब अंतिम निर्णय सुप्रीम लीडर के प्रभाव वाली IRGC के हाथों में होगा। सुरक्षा मामलों में कमांडर अहमद वाहिदी की भूमिका भी पहले से अधिक मजबूत बताई जा रही है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है लेकिन इससे ईरान की आंतरिक राजनीति को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। दोनों देशों के बीच बातचीत की तारीख और स्थान अब तक तय नहीं हो सके हैं। पाकिस्तान और कतर संभावित मेजबान देशों के रूप में सामने आए हैं और दोनों मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने उम्मीद जताई है कि होर्मुज स्ट्रेट को लेकर दोनों देशों के बीच जल्द कोई सहमति बन सकती है। यदि ऐसा होता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर राहत मिलने की संभावना बढ़ जाएगी।
इस बीच होर्मुज स्ट्रेट लगातार वैश्विक चिंता का केंद्र बना हुआ है। ईरान ने दावा किया है कि उसने इस क्षेत्र के ऊपर उड़ रहे एक MQ-9 रीपर ड्रोन को मार गिराया है हालांकि उसने यह स्पष्ट नहीं किया कि ड्रोन किस देश का था। दूसरी ओर एक लाइबेरियाई मालवाहक जहाज पर हमले की खबर भी सामने आई है जिसमें इंजन रूम में विस्फोट के बाद आग लग गई और एक नाविक लापता बताया गया। समुद्री सुरक्षा एजेंसियां पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।
यमन के हूती विद्रोहियों ने भी सऊदी अरब के नजरीन एयरपोर्ट पर ड्रोन हमला करने का दावा किया है। वहीं लाल सागर में बढ़ते खतरे के कारण कई सऊदी सुपरटैंकरों ने अपना समुद्री मार्ग बदल लिया है। इससे वैश्विक शिपिंग और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान के भीतर सत्ता का संतुलन पूरी तरह सुरक्षा प्रतिष्ठान के पक्ष में जाता है तो विदेश नीति और परमाणु कार्यक्रम को लेकर उसका रुख और अधिक कठोर हो सकता है। ऐसे में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ तनाव बढ़ने की आशंका भी बनी रहेगी। दूसरी ओर यदि वार्ता की कोई सकारात्मक पहल होती है तो इससे पश्चिम एशिया में लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने का रास्ता भी खुल सकता है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर ईरान के बदलते राजनीतिक घटनाक्रम और उसके अगले कदम पर टिकी हुई है।
