नई दिल्ली । जोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बु ने एक बार फिर भारत में तकनीकी विकास और आर्थिक क्षमता को लेकर महत्वपूर्ण विचार साझा किए हैं। उन्होंने डीप टेक यानी उन्नत तकनीकी क्षमता को किसी भी देश की दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती का आधार बताते हुए स्विट्जरलैंड और भारत के शिक्षकों की आय का उदाहरण दिया। उनके अनुसार किसी देश की वास्तविक समृद्धि केवल तकनीकी कंपनियों से नहीं, बल्कि उस तकनीक से मिलने वाली व्यापक आर्थिक क्षमता से तय होती है।
श्रीधर वेम्बु ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में सवाल उठाया कि स्विट्जरलैंड का एक स्कूल शिक्षक केवल दो से चार दिन की कमाई में एक आईफोन खरीद सकता है, जबकि भारत में एक शिक्षक को उसी आईफोन के लिए दो से चार महीने तक काम करना पड़ता है। उन्होंने इस अंतर को दोनों देशों की तकनीकी क्षमता और आर्थिक संरचना से जोड़ते हुए कहा कि यही डीप टेक की वास्तविक ताकत है।
उन्होंने अपने विचारों में कहा कि स्विट्जरलैंड जैसे छोटे देश के पास ऐसी उन्नत तकनीकी विशेषज्ञता है, जिसके कारण वह दुनिया की बड़ी कंपनियों के साथ अपनी शर्तों पर व्यापार करने की स्थिति में रहता है। उनके अनुसार जब किसी देश के पास वैश्विक स्तर की तकनीकी क्षमता होती है तो उसकी अर्थव्यवस्था विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर आय और अधिक अवसर उपलब्ध कराने में सक्षम होती है।
वेम्बु का मानना है कि तकनीकी विकास केवल नई नौकरियां पैदा करने तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार यह किसी देश को आर्थिक स्वतंत्रता, बेहतर विकल्प और नीति निर्धारण की क्षमता भी प्रदान करता है। यदि किसी राष्ट्र के पास मजबूत डीप टेक इकोसिस्टम हो तो वह केवल तकनीकी विशेषज्ञों ही नहीं, बल्कि शिक्षकों, किसानों, कारीगरों और अन्य गैर-तकनीकी पेशों से जुड़े लोगों को भी बेहतर वेतन देने की स्थिति में आ सकता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की वास्तविक क्रय शक्ति का आकलन केवल वेतन से नहीं, बल्कि इस बात से किया जाना चाहिए कि वह अपनी आय से कितनी जल्दी आवश्यक या महंगी वस्तुएं खरीद सकता है। इसी संदर्भ में उन्होंने आईफोन खरीदने की क्षमता को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे विभिन्न देशों की आय क्षमता का अंतर समझाया जा सके।
हालांकि श्रीधर वेम्बु ने यह भी स्वीकार किया कि आर्थिक विकल्पों के साथ कुछ चुनौतियां भी आती हैं। उनका कहना है कि मजबूत अर्थव्यवस्था होने के बावजूद कई देशों में आय असमानता देखने को मिलती है, जहां कुछ लोग अत्यधिक संपन्न होते हैं और कुछ अपेक्षाकृत कम आय अर्जित करते हैं। इसके बावजूद उनका मानना है कि तकनीकी क्षमता के बिना किसी देश के पास विकास के सीमित विकल्प ही बचते हैं।
अपने विचारों में उन्होंने यूनिवर्सल बेसिक इनकम यानी यूबीआई का भी उल्लेख किया। वेम्बु ने कहा कि यदि कोई देश केवल सहायता आधारित आर्थिक मॉडल पर निर्भर हो जाए तो यह दीर्घकाल में चुनौतीपूर्ण स्थिति पैदा कर सकता है। उनके अनुसार इस स्थिति से बचने का सबसे प्रभावी उपाय यह है कि देश पहले अपनी डीप टेक क्षमता विकसित करे और अनुसंधान एवं विकास पर व्यापक निवेश बढ़ाए।
श्रीधर वेम्बु का कहना है कि उनका विश्वास है कि अनुसंधान एवं विकास और ग्रामीण विकास एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। यदि देश तकनीकी नवाचार और शोध को प्राथमिकता देता है तो उसका लाभ केवल उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाज के हर वर्ग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक पहुंचेगा। उनका मानना है कि भविष्य की मजबूत अर्थव्यवस्था का आधार केवल उत्पादन नहीं, बल्कि ज्ञान, नवाचार और डीप टेक में निवेश होगा।
