नई दिल्ली। चीन ने पहली बार आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उसने हाल के वर्षों में परमाणु मिसाइलों की तैनाती के लिए बड़ी संख्या में भूमिगत साइलो तैयार किए हैं। चीन के सरकारी टीवी नेटवर्क सीसीटीवी पर प्रसारित एक डॉक्यूमेंट्री में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) रॉकेट फोर्स के अधिकारियों ने इस निर्माण कार्यक्रम से जुड़ी जानकारी साझा की। चीन का यह कबूलनामा ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थान लंबे समय से सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर उसके परमाणु हथियारों के विस्तार का दावा करते रहे हैं।
अमेरिका के दावे की हुई पुष्टि
पीएलए की 99वीं वर्षगांठ के मौके पर प्रसारित ‘Securing Victory’ नाम की डॉक्यूमेंट्री में रॉकेट फोर्स के इंजीनियरिंग अधिकारी कुई दाओहू ने भूमिगत मिसाइल ठिकानों के निर्माण का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने मिसाइलों के लिए ऐसे ठिकाने तैयार किए हैं, जिन्हें चीन की रणनीतिक क्षमता का अहम हिस्सा माना जा रहा है।
कुई के मुताबिक, इन साइलो को इस तरह तैयार किया गया है कि निर्माण पूरा होते ही वहां मिसाइलों की तैनाती की जा सके। उन्होंने कहा कि उनकी टीम ने परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल किया और कई इंजीनियर तथा सैनिक लंबे समय तक निर्माण स्थलों पर तैनात रहे।
300 से ज्यादा साइलो बनाने का दावा
अमेरिका और कई अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक वर्ष 2021 से ही सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर चीन के परमाणु मिसाइल साइलो निर्माण का दावा करते रहे हैं। अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन की 2025 की रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन ने 300 से अधिक मिसाइल साइलो तैयार किए हैं।
इन ठिकानों को चीन के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में शिनजियांग के हामी, गांसू के यूमेन और इनर मंगोलिया के यूलिन में बनाए जाने की बात कही गई थी।
चीन ने इससे पहले इन दावों की न तो पुष्टि की थी और न ही स्पष्ट रूप से खंडन किया था। बीजिंग लगातार यह कहता रहा है कि उसकी परमाणु नीति रक्षात्मक है और उसके परमाणु खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।
भारत से कितनी दूर हैं चीन के ये परमाणु ठिकाने?
चीन के इन परमाणु मिसाइल साइलो की लोकेशन भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, चीन का गांसू क्षेत्र अरुणाचल प्रदेश के सबसे करीब पड़ता है और दोनों के बीच दूरी करीब 1100 किलोमीटर बताई गई है।
वहीं, लद्दाख के लेह से शिनजियांग के हामी क्षेत्र की दूरी करीब 1600 किलोमीटर बताई जाती है। ऐसे में चीन के परमाणु हथियारों और मिसाइल साइलो का विस्तार भारत की सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
साइलो बनाने में आईं बड़ी चुनौतियां
चीनी अधिकारी के मुताबिक, भूमिगत मिसाइल साइलो का निर्माण बेहद चुनौतीपूर्ण था। भारी-भरकम उपकरणों और हिस्सों को सही तरीके से जोड़ना और उन्हें निर्धारित समय में स्थापित करना मुश्किल काम था। इसके बावजूद इंजीनियरों और सैनिकों ने तय समयसीमा के भीतर निर्माण पूरा किया।
हालांकि चीन ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इन नए साइलो में कौन-कौन सी मिसाइलें तैनात की जाएंगी। लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि इनमें DF-5 सीरीज की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM) को रखा जा सकता है।
दुनिया के किसी भी हिस्से तक पहुंच सकती है DF-5C
DF-5C को चीन की सबसे लंबी दूरी तक मार करने वाली परमाणु मिसाइलों में शामिल किया जाता है। चीन के मुताबिक, इसकी क्षमता दुनिया के किसी भी हिस्से तक पहुंचने की है। इस तरह की मिसाइलों को भूमिगत साइलो से लॉन्च करने के लिए तैयार किया जाता है।
नए साइलो को लेकर चीनी अधिकारी ने दावा किया कि इन्हें दुश्मन के हमले को झेलने और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई करने के लिहाज से डिजाइन किया गया है।
चीन की ‘नो फर्स्ट यूज’ नीति के बीच बढ़ता परमाणु जखीरा
चीन आधिकारिक तौर पर ‘नो फर्स्ट यूज’ परमाणु नीति की बात करता है। यानी उसका दावा है कि वह किसी देश के खिलाफ पहले परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करेगा। हालांकि, परमाणु हमला होने की स्थिति में जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता बनाए रखने की बात वह लगातार कहता रहा है।
नए भूमिगत साइलो का निर्माण इसी रणनीतिक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। चीन का यह आधिकारिक खुलासा इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे उसके परमाणु हथियारों के विस्तार को लेकर अमेरिका के वर्षों पुराने दावों को पहली बार चीन की ओर से सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किए जाने का संकेत मिलता है।
