ग्लासगो में आयोजित प्रतियोगिता में सोमन राणा ने 13.40 मीटर की दूरी तक गोला फेंकते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया। यह उनके करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। इससे पहले वह 2022 के एशियाई पैरा खेलों में रजत पदक जीत चुके थे, लेकिन इस बार उन्होंने अपनी मेहनत और लगातार अभ्यास के दम पर स्वर्णिम सफलता हासिल कर ली।
सोमन राणा ने बताया कि उनका जीवन वर्ष 2006 में पूरी तरह बदल गया था। भारतीय सेना में ड्यूटी के दौरान हुए हादसे में उन्होंने अपना दाहिना पैर खो दिया। उस समय उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती सामान्य जीवन में लौटने की थी। उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति को मामूली चोट लगती है तो चलना भी मुश्किल हो जाता है, लेकिन उनका पूरा पैर चला गया था। ऐसे में कृत्रिम पैर के सहारे दोबारा चलना और फिर खेलों में उतरना बेहद कठिन था।
उन्होंने बताया कि शुरुआती दिनों में उन्हें यह समझ ही नहीं आता था कि कृत्रिम पैर के साथ सामान्य जीवन कैसे जिएंगे। लेकिन समय के साथ उन्होंने खुद को संभाला और नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालना शुरू किया। वर्ष 2017 में उन्हें पैरालंपिक खेलों के बारे में जानकारी मिली और तभी उन्होंने तय कर लिया कि अब खेलों के जरिए देश के लिए कुछ बड़ा करना है।
सोमन ने कहा कि दूसरे पैरा खिलाड़ियों को देखकर उनके भीतर नया आत्मविश्वास पैदा हुआ। उन्होंने महसूस किया कि कई खिलाड़ी ऐसे हैं जिनके दोनों पैर नहीं हैं फिर भी वे दुनिया भर में देश का नाम रोशन कर रहे हैं। यही सोच उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बनी। उन्होंने अपने डर को पीछे छोड़कर लगातार मेहनत की और हर दिन खुद को पहले से बेहतर बनाने में जुट गए।
उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय भारतीय सेना, पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया, भारतीय खेल प्राधिकरण और अपने परिवार को दिया। सोमन ने कहा कि इन सभी का सहयोग और विश्वास ही उन्हें इस मुकाम तक लेकर आया। अगर परिवार और संस्थाओं का साथ नहीं मिलता तो शायद यह सपना पूरा करना इतना आसान नहीं होता।
सोमन राणा की कहानी यह साबित करती है कि जीवन में मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो हर चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है। उन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपना एक पैर खोया लेकिन उसी जज्बे के साथ खेल के मैदान में उतरकर भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। उनकी यह उपलब्धि लाखों युवाओं और दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में मिला यह स्वर्ण पदक केवल सोमन राणा की व्यक्तिगत जीत नहीं बल्कि भारतीय सेना, खेल जगत और पूरे देश के लिए गर्व का क्षण है। उनका संघर्ष और सफलता आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि सच्ची जीत शरीर की ताकत से नहीं बल्कि मन की दृढ़ता और हौसले से हासिल होती है।
