सेबी की जांच में सामने आया कि कंपनी की हैदराबाद स्थित मूल्यवान जमीन को आवश्यक कॉरपोरेट मंजूरियों के बिना एस्सेल समूह की कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के बदले गिरवी रखा गया था। नियामक ने इसे कॉरपोरेट गवर्नेंस और लिस्टिंग नियमों का गंभीर उल्लंघन माना। अंतिम आदेश में कहा गया कि इस प्रक्रिया में नियामकीय प्रावधानों का पालन नहीं किया गया और आवश्यक स्वीकृतियां भी नहीं ली गईं।
सेबी के आदेश के अनुसार जी एंटरटेनमेंट पर 30 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया है जबकि पुनीत गोयनका पर 58 लाख रुपए और सुभाष चंद्रा पर 60 लाख रुपए का दंड लगाया गया है। नियामक ने सभी संबंधित पक्षों को 45 दिनों के भीतर जुर्माने की राशि जमा करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही यह भी माना कि लिस्टिंग ऑब्लिगेशंस एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स रेगुलेशंस 2015 और प्रोहिबिशन ऑफ फ्रॉडुलेंट एंड अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिसेज रेगुलेशंस 2003 के प्रावधानों का उल्लंघन हुआ है।
मामले की शुरुआत वित्त वर्ष 2018-19 के वैधानिक ऑडिट के दौरान हुई थी। ऑडिट में कंपनी की कुछ अचल संपत्तियों के मूल स्वामित्व दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आई थी। इसके बाद सेबी ने विस्तृत जांच शुरू की। जांच में पता चला कि दिसंबर 2016 में एस्सेल समूह की चार कंपनियों ने इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड से 726 करोड़ रुपए का कर्ज लिया था। इन कंपनियों पर पुनीत गोयनका सुभाष चंद्रा और उनके परिवार का प्रभावी नियंत्रण था।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि जब कर्ज लेने वाली कंपनियां आवश्यक सुरक्षा बनाए रखने में विफल रहीं तब नवंबर 2018 में अतिरिक्त संपार्श्विक उपलब्ध कराने के लिए नोटिस जारी किया गया। इसके बाद दिसंबर 2018 में जी एंटरटेनमेंट की हैदराबाद स्थित जमीन के मूल दस्तावेज कर्ज के लिए अतिरिक्त सुरक्षा के रूप में जमा कराए गए ताकि उस संपत्ति पर प्रथम श्रेणी का बंधक बनाया जा सके।
हालांकि कंपनी ने दावा किया कि इस प्रक्रिया के लिए सभी आवश्यक मंजूरियां प्राप्त की गई थीं लेकिन सेबी की जांच में ऑडिट समिति निदेशक मंडल या शेयरधारकों की ओर से ऐसी किसी पूर्व स्वीकृति का कोई प्रमाण नहीं मिला। बाद में कंपनी ने स्वयं नियामक को बताया कि प्रबंधन और निदेशक मंडल इस बंधक की प्रक्रिया से अनभिज्ञ थे और उन्होंने इस लेनदेन को मंजूरी नहीं दी थी।
सेबी ने अपने आदेश में कहा कि यह संबंधित पक्षों के बीच हुआ लेनदेन था जिसके लिए नियमानुसार पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक था। वित्तीय विवरणों में भी इस संबंध में आवश्यक खुलासे और स्वीकृतियों का पालन नहीं किया गया। नियामक ने स्पष्ट किया कि सूचीबद्ध कंपनियों में निवेशकों के हितों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और कॉरपोरेट गवर्नेंस के नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ भविष्य में भी इसी तरह सख्त कार्रवाई जारी रहेगी।
