27 वर्षीय सीमा कालीरमन ने ग्लासगो में हुए महिला डिस्कस थ्रो फाइनल में शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत के नाम कांस्य पदक दर्ज कराया। यह उनके करियर का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय पदक है, जिसने उन्हें देश की नई प्रेरणादायक खिलाड़ियों की सूची में शामिल कर दिया है।
सीमा का सफर आसान नहीं रहा। घुटने की गंभीर चोट के कारण उन्हें तीन साल से अधिक समय तक प्रतियोगिताओं से दूर रहना पड़ा। इसके बाद मातृत्व की जिम्मेदारी आई और चार साल के बेटे रुद्र की परवरिश के साथ खेल में वापसी करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार मेहनत के दम पर फिर से खुद को साबित किया।
सीमा सिर्फ एक एथलीट ही नहीं बल्कि चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय, भिवानी से फिजिकल एजुकेशन में पीएचडी भी कर रही हैं। खेल और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाते हुए उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया। उनके इस सफर में सबसे बड़ा साथ उनके पति और कोच रविंदर कालीरमन ने दिया। रविंदर स्वयं राष्ट्रीय स्तर के डिस्कस थ्रो खिलाड़ी रह चुके हैं और उनकी ट्रेनिंग ने सीमा की वापसी को नई दिशा दी।
2022 में बेटे रुद्र के जन्म के बाद लगभग 11 महीने के ब्रेक के बावजूद सीमा ने जब मैदान पर वापसी की तो पहले से अधिक मजबूत नजर आईं। जहां पहले उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 48.08 मीटर था, वहीं वापसी के बाद उन्होंने इसे लगातार बेहतर करते हुए 57.19 मीटर तक पहुंचाया। इसके बाद भुवनेश्वर में आयोजित इंडियन चैंपियनशिप 2026 में उन्होंने 59.73 मीटर का शानदार थ्रो कर अपना नया व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ रिकॉर्ड बनाया।
कॉमनवेल्थ गेम्स के फाइनल में सीमा के छह प्रयासों में से केवल दो थ्रो ही वैध रहे, क्योंकि कई बार डिस्कस साइड नेटिंग में फंस गया। इसके बावजूद उन्होंने धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखा और शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक अपने नाम कर लिया।
पिछले दो वर्षों में सीमा ने लगातार शानदार प्रदर्शन किया है। उन्होंने 2025 के नेशनल गेम्स में स्वर्ण पदक जीता, राष्ट्रीय चैंपियन बनीं और 2026 दक्षिण एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी गोल्ड मेडल हासिल किया। इन्हीं उपलब्धियों के दम पर उन्होंने एशियाई खेल 2026 और कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए भारतीय टीम में जगह बनाई।
सीमा कालीरमन की कहानी सिर्फ एक मेडल जीतने की नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और आत्मविश्वास की कहानी है। उन्होंने दिखा दिया कि अगर जुनून सच्चा हो तो चोट, जिम्मेदारियां और कठिन परिस्थितियां भी सफलता की राह नहीं रोक सकतीं। उनका कांस्य पदक भारतीय खेल जगत के लिए प्रेरणा का नया अध्याय है और आने वाली पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए यह संदेश भी कि सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत और धैर्य सबसे बड़ी ताकत होते हैं।
