लेखा परीक्षा रिपोर्ट के मुख्य अंशों के अनुसार स्वास्थ्य क्षेत्र में आवंटित बजट का एक बड़ा हिस्सा निर्धारित समय सीमा तक अप्रयुक्त पड़ा रहा। वैश्विक महामारी के समय उपलब्ध कराए गए महत्वपूर्ण चिकित्सा संसाधनों, जैसे ऑक्सीजन संयंत्रों और सघन चिकित्सा इकाई उपकरणों के कई केंद्रों पर चालू न होने का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त, गंभीर प्राकृतिक आपदाओं के उपरांत राहत राशि के पुनरावृत्त वितरण के मामले भी सामने आए हैं, जिससे राज्य के खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ा। इन निष्कर्षों ने आपदा प्रबंधन और लाभार्थी सत्यापन प्रणालियों की दक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रतिवेदन में औद्योगिक विकास हेतु भूमि आवंटन और विभिन्न राज्य स्तरीय कल्याणकारी योजनाओं के संचालन में भी प्रक्रियागत त्रुटियों की ओर संकेत किया गया है। निर्धारित नियमों का पूरी तरह पालन न होने से हुए वित्तीय नुकसान के साथ-साथ राज्य के समग्र राजकोषीय घाटे और बढ़ते ऋण भार को लेकर चिंता जताई गई है। बजट के एक बड़े हिस्से का वर्ष के अंत तक बिना खर्च हुए रह जाना और अतिरिक्त व्यय के लिए आवश्यक विधायी स्वीकृतियों के लंबित रहने को वित्तीय अनुशासन के दृष्टिकोण से गंभीर माना जा रहा है।
संसदीय पटल पर रिपोर्ट की प्रति रखे जाने के उपरांत मुख्य विपक्षी दल ने इन निष्कर्षों को प्रशासनिक विफलता करार देते हुए कड़े दंडात्मक कदमों की मांग की है। विपक्षी प्रतिनिधियों का कहना है कि जनकल्याणकारी योजनाओं में पाई गई यह ढिलाई राज्य के दीर्घकालिक आर्थिक विकास को प्रभावित करती है। दूसरी ओर, प्रशासनिक सूत्रों का तर्क है कि ऑडिट रिपोर्ट में उठाए गए अधिकांश बिंदु प्रक्रियागत और तकनीकी प्रकृति के हैं, जिन पर विभागीय समीक्षा के माध्यम से स्थिति स्पष्ट की जाएगी। फिलहाल, इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद राज्य के प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
