वास्तु सिद्धांतों के अनुसार, भवन में बाथरूम के निर्माण के लिए सबसे उपयुक्त और शुभ दिशा उत्तर या उत्तर-पश्चिम यानी वायव्य कोण मानी गई है। इसके विपरीत, दक्षिण-पूर्व अर्थात आग्नेय कोण या फिर घर के बिल्कुल मध्य भाग जिसे ब्रह्मस्थान कहा जाता है, वहां भूलकर भी बाथरूम का निर्माण नहीं करना चाहिए। दक्षिण दिशा में स्थित बाथरूम न केवल परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि निरंतर रहने वाले मानसिक तनाव का कारण भी बनता है। इसके साथ ही, खिड़कियों और वेंटिलेशन की सही व्यवस्था न होने से उत्पन्न होने वाला अंधकार भी नकारात्मकता को बढ़ावा देता है, इसलिए वहां हमेशा पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था होनी चाहिए।
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार जल के अनियंत्रित प्रवाह को सीधे तौर पर धन की हानि से जोड़कर देखा जाता है। यदि बाथरूम का कोई नल अथवा पाइपलाइन लगातार टपक रही है, तो इसे केवल पानी की बर्बादी नहीं बल्कि संचित धन के धीरे-धीरे नष्ट होने का स्पष्ट सूचक माना जाता है। ऐसे तकनीकी दोषों को बिना किसी विलंब के तुरंत ठीक कराया जाना चाहिए ताकि वित्तीय स्थिरता प्रभावित न हो। इसके अतिरिक्त, स्नान के पश्चात पूरे फर्श को अच्छी तरह सुखा लेना चाहिए क्योंकि सीलन, अत्यधिक नमी और जलभराव के कारण उत्पन्न होने वाले दोष घर के भीतर नकारात्मक ऊर्जा के संचरण को तीव्र कर देते हैं।
बाथरूम के भीतर साफ-सफाई और अनुशासन का अभाव भी दरिद्रता को आमंत्रित करता है। अक्सर लोग टूटी हुई बाल्टी, खाली प्लास्टिक की बोतलें, या अनुपयोगी सौंदर्य प्रसाधनों की सामग्रियां वहीं छोड़ देते हैं, जो वास्तु सम्मत नहीं है। उपयोग के उपरांत बाथरूम के मुख्य द्वार को हमेशा बंद रखना अनिवार्य है, क्योंकि खुला हुआ द्वार वहां की दूषित ऊर्जा को घर के अन्य कमरों में फैलने का अवसर देता है। दर्पण की स्थिति भी इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बाथरूम का शीशा कभी भी प्रवेश द्वार के ठीक सामने नहीं लगाना चाहिए, अन्यथा वहां से निकलने वाली नकारात्मक तरंगें परावर्तित होकर संपूर्ण गृह क्षेत्र को प्रभावित करती हैं।
घर की सुख-शांति को बनाए रखने और दूषित प्रभावों को बेअसर करने के लिए वास्तुकला में कुछ बेहद सरल उपाय भी सुझाए गए हैं। इसके अंतर्गत, एक छोटी कांच की कटोरी में समुद्री अथवा सेंधा नमक भरकर बाथरूम के किसी सुरक्षित कोने में स्थापित किया जा सकता है। माना जाता है कि नमक में वातावरण की अशुद्धियों और नकारात्मकता को अवशोषित करने की अद्भुत क्षमता होती है। इस नमक को प्रत्येक सात से दस दिनों के भीतर बदलते रहना चाहिए। इन मूलभूत नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करने से न केवल गृह जनित दोषों का शमन होता है, बल्कि पारिवारिक आय में वृद्धि और मानसिक संतोष की प्राप्ति भी संभव होती है।
