भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स इस बात को लेकर बेहद हैरान और क्रोधित हैं कि करीब 19 वर्ष पहले की गई एक संक्षिप्त यात्रा को बिना किसी पुख्ता वैज्ञानिक और प्रयोगशाला साक्ष्यों के इस तरह वैश्विक मंचों पर उछाला जा रहा है। इंटरनेट पर लोगों का आरोप है कि विदेशी मीडिया संस्थान अक्सर भारत को एक अस्वच्छ और असुरक्षित पर्यटन स्थल के रूप में चित्रित करने की फिराक में रहते हैं। यूजर्स सवाल उठा रहे हैं कि इतने लंबे अंतराल के बाद अचानक इस मामले को तूल देकर वैश्विक पर्यटकों के मन में भारत के प्रति भय पैदा करने का एक प्रोपेगेंडा चलाया जा रहा है, जो पूरी तरह से तर्कहीन है।
इस गंभीर विवाद के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तीखे तंज और मीम्स की भी बाढ़ आ गई है। भारतीय यूजर्स ब्रिटिश महिला के इस दावे के वैज्ञानिक तर्क पर सवाल उठाते हुए ब्रिटेन की दिवंगत महारानी एलिजाबेथ द्वितीय का उदाहरण दे रहे हैं। लोग लिख रहे हैं कि महारानी एलिजाबेथ भी वर्ष 1997 में भारत दौरे पर आई थीं और उनका निधन वर्ष 2022 में हुआ, तो क्या अब उनके निधन का उत्तरदायित्व भी उनके दशकों पुराने भारत दौरे पर मढ़ दिया जाएगा। यूजर्स का कहना है कि 2007 से लेकर अब तक के लंबे समय में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में रहने, खाने-पीने और यात्रा करने के बाद किसी भी बीमारी के लिए केवल भारत को दोष देना पूरी तरह से हास्यास्पद और बेतुका है।
चिकित्सीय इतिहास के अनुसार, इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब भारत से लौटने के चार वर्ष बाद यानी 2011 में लोरी डेनमैन को स्वास्थ्य संबंधी गंभीर जटिलताओं का अहसास हुआ। चिकित्सीय परीक्षण के दौरान उनके शरीर से एक मीटर लंबा टेपवर्म प्राप्त हुआ, जिसके बाद कराए गए एमआरआई स्कैन में उनके मस्तिष्क के भीतर 38 परजीवी सिस्ट होने की पुष्टि हुई। ‘न्यूरोसिस्टीसर्कोसिस’ नामक यह दुर्लभ बीमारी सूअर के फीताकृमि ‘टीनिया सोलियम’ के कारण होती है, जो मानव के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित करती है और दुनिया भर में मिर्गी के दौरों का एक प्रमुख कारण मानी जाती है। इस संक्रमण के प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए महिला को अब जीवन भर चिकित्सीय दवाओं पर निर्भर रहना पड़ेगा।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के सुरक्षा मानकों के अनुसार, यह संक्रमण केवल दूषित या अधपके सूअर का मांस खाने से ही नहीं, बल्कि दूषित पानी और संक्रमित व्यक्ति द्वारा बिना स्वच्छता के छुए गए कच्चे फलों तथा सब्जियों के सेवन से भी इंसानी शरीर में प्रवेश कर सकता है। पेट में जाने के बाद ये सूक्ष्म अंडे लार्वा का रूप ले लेते हैं और रक्त प्रवाह के माध्यम से मस्तिष्क की मांसपेशियों तक पहुंच जाते हैं। हालांकि, ब्रिटेन के संक्रामक रोग विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि ब्रिटेन में सख्त खाद्य सुरक्षा कानूनों के कारण इसके मामले अत्यंत दुर्लभ हैं और भारत में इसके मरीजों की संख्या अधिक है, इसलिए मरीज की ट्रैवल हिस्ट्री को आधार बनाकर ही इस तरह की चिकित्सकीय संभावना व्यक्त की गई है, क्योंकि यह परजीवी बिना कोई लक्षण दिखाए वर्षों तक मस्तिष्क में निष्क्रिय पड़ा रह सकता है।
