ऐसी ही पहली घटना महान संत और सिद्ध तपस्वी मच्छिंद्रनाथ जी से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार मच्छिंद्रनाथ जी भगवान श्रीराम की भक्ति में पूरी तरह लीन होकर रामेश्वरम के समीप समुद्र में स्नान कर रहे थे। उसी समय वहां मौजूद हनुमान जी ने एक साधारण वानर का रूप धारण कर उनकी परीक्षा लेने का विचार किया। हनुमान जी ने अपनी मायावी शक्ति से वहां मूसलाधार बारिश शुरू कर दी और स्वयं को बचाने के लिए एक कृत्रिम गुफा बनाने का उपक्रम करने लगे। जब मच्छिंद्रनाथ जी ने उन्हें इस कृत्य पर टोकते हुए ज्ञान दिया, तो हनुमान जी ने उनकी आध्यात्मिक क्षमता पर प्रश्न उठाते हुए उन्हें युद्ध की सीधी चुनौती दे दी। इसके बाद दोनों के मध्य एक भीषण युद्ध छिड़ गया, परंतु मच्छिंद्रनाथ जी की मंत्र शक्ति और योग बल के सामने हनुमान जी का प्रत्येक प्रहार निष्फल साबित हुआ। अंततः वायुदेव के हस्तक्षेप के बाद इस युद्ध को विराम दिया गया और हनुमान जी ने सहर्ष अपनी हार स्वीकार की।
द्वितीय प्रसंग रामायण काल के सबसे विनाशकारी युद्ध के दौरान का है, जो रावण के परम पराक्रमी पुत्र मेघनाद यानी इंद्रजीत से संबद्ध है। माता सीता की खोज में लंका पहुंचे हनुमान जी ने जब अशोक वाटिका को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया और रावण के छोटे पुत्र अक्षय कुमार का वध कर दिया, तब लंकाधिपति ने क्रोधित होकर मेघनाद को रणभूमि में भेजा। युद्ध क्षेत्र में जब मेघनाद के सभी दिव्य अस्त्र-शस्त्र हनुमान जी के सामने विफल हो गए, तब उसने अत्यंत विवश होकर पवनपुत्र पर सीधे ब्रह्मास्त्र का संधान कर दिया। यद्यपि हनुमान जी को स्वयं ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त था कि कोई भी अस्त्र उनका अनिष्ट नहीं कर सकता, परंतु सृष्टि के रचयिता और ब्रह्मास्त्र की मर्यादा एवं मान रखने के लिए हनुमान जी ने स्वेच्छा से स्वयं को उस बंधन में बंधने दिया। तकनीकी दृष्टिकोण से इस प्रसंग में मेघनाद हनुमान जी की गति को रोकने और उन्हें बंदी बनाने में सफल रहा था।
तृतीय और सर्वाधिक भावुक कर देने वाला वृत्तांत भगवान श्रीराम के आत्मज लव और कुश से जुड़ा हुआ है। लंका विजय के पश्चात जब अयोध्या में प्रभु श्रीराम द्वारा अश्वमेध यज्ञ का भव्य आयोजन किया गया, तो यज्ञ का अश्व देश के विभिन्न हिस्सों में भ्रमण कर रहा था। इसी दौरान महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में निवास कर रहे बालक लव और कुश ने उस अश्व को बंदी बना लिया। अश्व को मुक्त कराने हेतु जब श्रीराम की चतुरंगिणी सेना वहां पहुंची, तो दोनों बालकों के अभूतपूर्व युद्ध कौशल के सम्मुख लक्ष्मण और शत्रुघ्न जैसे महारथी भी परास्त हो गए। स्थिति को नियंत्रण से बाहर होते देख स्वयं हनुमान जी, भरत और सुग्रीव के साथ युद्ध के मैदान में उतरे।
रणभूमि में जब हनुमान जी ने इन दो अत्यंत छोटे बालकों के अलौकिक शौर्य और पराक्रम को देखा, तो वे विस्मय में पड़ गए। वास्तविकता का पता लगाने के लिए जब उन्होंने नेत्र बंद कर ध्यान लगाया, तो उन्हें तुरंत यह बोध हो गया कि ये दोनों बालक कोई साधारण क्षत्रिय नहीं, बल्कि उनके आराध्य प्रभु श्रीराम और माता सीता के ही अंश हैं। इस सत्य से अवगत होने के पश्चात हनुमान जी के लिए अपने ही स्वामी की संतानों पर अस्त्र उठाना सर्वथा असंभव हो गया। उन्होंने तुरंत युद्ध न करने का नीतिगत निर्णय लिया और अस्त्र त्याग कर शांत खड़े हो गए। इसके बाद लव और कुश ने उन पर निरंतर कई तीखे प्रहार किए, किंतु हनुमान जी ने बिना किसी प्रतिरोध या पलटवार के सब कुछ अत्यंत शांत भाव से सहन किया और प्रेम पूर्वक अपनी पराजय स्वीकार कर ली।
