चार्जशीट के अनुसार, सरला भट श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में नर्स के रूप में कार्यरत थीं। उन्हें लगातार नौकरी छोड़ने और घाटी से बाहर जाने की धमकियां मिल रही थीं, लेकिन उन्होंने अपना कार्य जारी रखा। आरोप है कि 14 अप्रैल 1990 को उनका अपहरण किया गया और कुछ दिनों बाद उनका शव गोलियों से छलनी अवस्था में बरामद हुआ। जांच एजेंसी का कहना है कि यह कोई सामान्य हत्या नहीं बल्कि पूर्व नियोजित आतंकी वारदात थी।
मामले में कुल पांच लोगों को आरोपी बनाया गया है। इनमें यासीन मलिक, अब्दुल हमीद शेख, मोहम्मद यूसुफ सोफी उर्फ इदरीस, गुलाम मोहम्मद टपलू और खुर्शीद अहमद चाल्कू के नाम शामिल हैं। इनमें से तीन आरोपियों की मृत्यु हो चुकी है, जबकि खुर्शीद अहमद चाल्कू को फरार बताया गया है। यासीन मलिक फिलहाल एक अन्य मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है।
जांच एजेंसी का दावा है कि सरला भट को पहले झूठा पुलिस मुखबिर बताकर निशाना बनाया गया। चार्जशीट के अनुसार उनका अपहरण अस्पताल के पास से किया गया, जिसके बाद उन्हें कथित रूप से प्रताड़ित किया गया और अंत में गोली मारकर हत्या कर दी गई। एजेंसी का कहना है कि पूरी वारदात एक संगठित आतंकी नेटवर्क के निर्देश पर अंजाम दी गई थी।
चार्जशीट में कई प्रत्यक्षदर्शियों के बयान शामिल किए गए हैं। जांच के अनुसार, गवाहों ने अपहरण से पहले सरला भट को आरोपियों के साथ देखा था और बाद की घटनाओं का भी विस्तृत विवरण दिया है। कई स्वतंत्र गवाहों ने भी कथित आरोपियों की पहचान की है। इसके अलावा घटनास्थल और अपहरण के रास्ते से जुड़े दस्तावेज तथा पहचान संबंधी रिकॉर्ड भी अदालत में पेश किए गए हैं।
मेडिकल और फोरेंसिक रिपोर्ट को भी अभियोजन पक्ष का महत्वपूर्ण आधार बताया गया है। जांच में सरला भट के शरीर पर कई गोली लगने के निशान, गंभीर चोटें और यातना के संकेत मिलने का उल्लेख किया गया है। बैलिस्टिक जांच में घटनास्थल से बरामद कारतूसों के एक ही हथियार से चलाए जाने की पुष्टि होने का दावा किया गया है, जिसे प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों से भी जोड़ा गया है।
चार्जशीट में घटनास्थल से बरामद कथित संगठनात्मक दावा-पत्र, अस्पताल कर्मचारियों के बयान और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का भी उल्लेख किया गया है। जांच एजेंसी का कहना है कि इन सभी साक्ष्यों से यह मामला एक सुनियोजित आतंकी साजिश की ओर संकेत करता है। अब विशेष अदालत चार्जशीट पर संज्ञान लेने के बाद आगे की न्यायिक प्रक्रिया तय करेगी। साथ ही एजेंसी का मानना है कि इस जांच से उस दौर में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाकर की गई अन्य घटनाओं की जांच में भी नए तथ्य सामने आ सकते हैं।
