यह प्लांट वैश्विक स्मार्टफोन आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है और यहां iPhone के लिए बैक पैनल सहित कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स का निर्माण किया जाता है। पिछले कुछ महीनों से स्थानीय किसानों द्वारा लगातार शिकायतें की जा रही थीं कि फैक्ट्री से निकलने वाला अपशिष्ट जल उनकी कृषि भूमि और खुले कुओं के पानी की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है। किसानों का दावा था कि इससे खेती और जल उपयोग दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
इन शिकायतों के बाद संबंधित अधिकारियों ने विस्तृत निरीक्षण प्रक्रिया शुरू की। जांच के दौरान कई बार प्लांट परिसर और उसके आसपास के क्षेत्रों का निरीक्षण किया गया। निरीक्षण रिपोर्ट में संकेत मिले कि फैक्ट्री परिसर में मौजूद वर्षा जल संचयन संरचना में अपशिष्ट जल पहुंच रहा था। अधिकारियों का मानना है कि इस संरचना के ओवरफ्लो होने के कारण पानी आसपास के क्षेत्रों तक पहुंचा और भूजल स्रोतों को प्रभावित कर सकता है।
नियामकीय एजेंसियों का कहना है कि कंपनी को पहले भी स्थिति सुधारने और आवश्यक पर्यावरणीय मानकों का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि जांच रिपोर्ट में यह आरोप लगाया गया कि निर्धारित समयावधि के भीतर अपेक्षित सुधारात्मक कदम पर्याप्त रूप से नहीं उठाए गए। इसी आधार पर कंपनी से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा गया है।
मामले की गंभीरता इस वजह से भी बढ़ गई है क्योंकि भारत वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में उत्पादन क्षमता बढ़ाई है। ऐसे में किसी बड़े विनिर्माण संयंत्र पर पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के आरोप निवेशकों, उद्योग जगत और नीति निर्माताओं के लिए भी महत्वपूर्ण विषय बन जाते हैं।
दूसरी ओर, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने अपने ऊपर लगे आरोपों को लेकर सफाई पेश की है। कंपनी का कहना है कि उसने स्वतंत्र और मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं से परीक्षण करवाए हैं, जिनमें सभी निर्धारित पर्यावरणीय मानकों के अनुपालन की पुष्टि हुई है। कंपनी ने यह भी कहा है कि वह पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय समुदायों के हितों और जिम्मेदार औद्योगिक संचालन के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
कंपनी ने संबंधित अधिकारियों को अपना जवाब सौंप दिया है और अब आगे की कार्रवाई नियामकीय समीक्षा पर निर्भर करेगी। यदि जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया तो बिजली आपूर्ति रोकने, संचालन पर प्रतिबंध लगाने अथवा प्लांट बंद करने जैसी कठोर कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है। फिलहाल उद्योग जगत की नजर इस मामले पर टिकी हुई है, क्योंकि इसका असर केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि भारत के उभरते इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र की छवि पर भी पड़ सकता है।
