यह अत्यंत क्रूर और खौफनाक घटना 9 सितंबर 2020 की है, जब पाकिस्तानी मूल की एक फ्रांसीसी महिला अपने तीन मासूम बच्चों के साथ सियालकोट-लाहौर मोटरवे पर कार से यात्रा कर रही थी। देर रात अचानक कार का ईंधन समाप्त हो जाने के कारण उनका परिवार सुनसान सड़क के किनारे असहाय स्थिति में फंस गया था। महिला अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कार के दरवाजे बंद कर भीतर ही मदद की प्रतीक्षा कर रही थी। इसी दौरान हथियारों से लैस हमलावरों ने वाहन की खिड़की का शीशा तोड़कर महिला को जबरन बाहर घसीट लिया और उसके ही रोते-बिलखते बच्चों के सामने बंदूक की नोक पर उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म की जघन्य वारदात को अंजाम दिया। अपराधी वहां से भागने से पहले पीड़ित परिवार से नकदी, आभूषण और बैंक कार्ड भी लूट ले गए थे।
इस घटना के सार्वजनिक होने के बाद पूरे पाकिस्तान में जनाक्रोश भड़क उठा था और कार्यस्थलों तथा सार्वजनिक मार्गों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कड़े कानूनों की मांग को लेकर देशव्यापी प्रदर्शन हुए थे। जनभावनाएं उस समय और अधिक उग्र हो गई थीं, जब तत्कालीन लाहौर पुलिस प्रमुख उमर शेख ने प्रशासनिक विफलता को छुपाने के लिए उल्टा पीड़िता के समय और मार्ग चयन पर ही अनुचित सवाल खड़े कर दिए थे। हालांकि, बढ़ते दबाव के बीच पुलिस प्रशासन ने अपराधियों को पकड़ने के लिए एक व्यापक वैज्ञानिक अभियान चलाया। जांचकर्ताओं ने अत्याधुनिक मोबाइल फोन डेटा विश्लेषण और घटनास्थल से एकत्र किए गए डीएनए नमूनों की सहायता से आरोपियों को दबोचा था। बाद में न्यायिक कार्यवाही के दौरान पीड़िता ने भी दोनों की पहचान की थी और एक आरोपी ने मजिस्ट्रेट के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था।
उच्च न्यायालय में अपील की सुनवाई के दौरान दोषियों के विधिक सलाहकारों ने दलील दी थी कि जांच एजेंसी की प्रक्रिया में कई तकनीकी कमियां हैं और साक्ष्य पूरी तरह विश्वसनीय नहीं हैं। इसके विपरीत, सरकारी वकीलों ने अदालत के समक्ष अकाट्य वैज्ञानिक (डीएनए) और तकनीकी (सेलुलर लोकेशन) प्रमाण प्रस्तुत किए, जो सीधे तौर पर अपराधियों की अपराध स्थल पर उपस्थिति और संलिप्तता को प्रमाणित करते थे। उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के तर्कों को वैध मानते हुए स्पष्ट किया कि निचली अदालत का फैसला पूर्णतः न्यायसंगत था। इस निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रसिद्ध वैश्विक उद्यमी और टेस्ला प्रमुख एलन मस्क ने भी सोशल मीडिया पर ‘शाबाश पाकिस्तान’ लिखते हुए न्यायिक कड़ेपन की सराहना की और कहा कि पश्चिमी देशों को भी हिंसक अपराधों के खिलाफ ऐसे ही कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है।
