जानकारी के अनुसार वर्ष 2022-23 में अनाज उपार्जन कार्यों के लिए पात्रता हासिल करने के उद्देश्य से कंपनी ने कई फर्जी दस्तावेज तैयार किए। सरकारी नियमों के मुताबिक ऐसी संस्थाओं के पास कम से कम 50 लाख रुपए की नकद राशि या क्रेडिट लिमिट होना अनिवार्य है, लेकिन जांच में पाया गया कि कंपनी ने अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत दिखाने के लिए आईसीआईसीआई बैंक का एक ऐसा खाता प्रस्तुत किया, जो वास्तव में उसके नाम पर था ही नहीं। बैंक सत्यापन के दौरान यह फर्जीवाड़ा सामने आ गया।
जांच का दायरा बढ़ा तो किसान सदस्यों की सूची भी संदेह के घेरे में आ गई। अधिकारियों ने सूची में दर्ज मोबाइल नंबरों पर संपर्क किया तो कई ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कहा कि वे न तो कंपनी को जानते हैं और न ही उसके सदस्य हैं। कई नामों के साथ पते, शेयर राशि और अन्य जरूरी जानकारियां भी दर्ज नहीं मिलीं। इससे स्पष्ट हुआ कि कागजों में फर्जी सदस्य जोड़कर संस्था को पात्र साबित किया गया और सरकारी लाभ हासिल किया गया।
मामले में एक और बड़ा खुलासा कर्मचारियों की नियुक्तियों को लेकर हुआ। कंपनी के प्रबंधक मनीष चौरसिया, लेखापाल कमलेश साहू और कंप्यूटर ऑपरेटर नीलेश विश्वकर्मा की नियुक्ति बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के की गई। रिकॉर्ड में न तो बैठक का कोई प्रस्ताव मिला और न ही नियुक्ति की स्वीकृति संबंधी दस्तावेज। कई दस्तावेजों पर हस्ताक्षरों में भी अंतर पाया गया, जिससे जालसाजी की आशंका और गहरा गई।
मध्य प्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ मर्यादित, जबलपुर की रिपोर्ट में सामने आया कि कंपनी ने प्रासंगिक व्यय, हैंडलिंग चार्ज और कमीशन के नाम पर 39 लाख 67 हजार 781 रुपए की सरकारी सहायता राशि प्राप्त की थी। जांच एजेंसियों का दावा है कि यह राशि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हासिल की गई।
पूरे मामले की शुरुआत किसान मजदूर महासंघ के जिला अध्यक्ष राजेंद्र सिंह ठाकुर की शिकायत से हुई थी। कलेक्टर के निर्देश पर हुई उच्च स्तरीय जांच ने फर्जीवाड़े की परतें खोल दीं। इसके बाद किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग के सहायक संचालक रवि कुमार आम्रवंशी ने पाटन थाने में शिकायत दर्ज कराई।
पुलिस ने कंपनी के डायरेक्टर सचिन दुबे, रंजना पाण्डे, संदीप दुबे, अंशुल बर्मन, नेहा पाण्डे और उमा सिंह के साथ प्रबंधक मनीष चौरसिया, लेखापाल कमलेश साहू और कंप्यूटर ऑपरेटर नीलेश विश्वकर्मा को आरोपी बनाया है। फिलहाल आरोपियों की तलाश में दबिश दी जा रही है और यह पता लगाया जा रहा है कि सरकारी राशि का उपयोग कहां और कैसे किया गया। जांच एजेंसियों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस पूरे नेटवर्क से जुड़े और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं।
