नई दिल्ली(New Delhi)।उत्तर प्रदेश का बांदा इन दिनों भीषण गर्मी की मार झेल रहा है, जहां तापमान 48 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है। कभी राजस्थान और मध्यप्रदेश के सबसे गर्म शहरों में गिने जाने वाले इलाके अब पीछे छूटते दिख रहे हैं, और बुंदेलखंड का बांदा देश के सबसे गर्म क्षेत्रों में शामिल होता जा रहा है।
सुबह 9 बजे के बाद ही शहर की सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता है। तेज धूप और लू के कारण लोग घरों में कैद रहने को मजबूर हैं। दिहाड़ी मजदूरों की हालत सबसे ज्यादा खराब है, जहां लोहे के तसले तक इतने तप जाते हैं कि हाथों में छाले पड़ जाते हैं। इसके बावजूद रोजी-रोटी के लिए मजदूर तपती धूप में काम करने को मजबूर हैं।
खेती-किसानी भी इस भीषण गर्मी से बुरी तरह प्रभावित हो रही है। किसान दिन के समय खेतों में सिंचाई नहीं कर पा रहे, इसलिए अब रात के समय फसल को पानी दिया जा रहा है। मूंग और सब्जियों की फसलें बचाने के लिए किसान दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, लेकिन बढ़ते तापमान और सूखी मिट्टी ने उनकी चिंता बढ़ा दी है।
स्थानीय विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का मानना है कि इस स्थिति के पीछे प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारण जिम्मेदार हैं। केन नदी में लंबे समय से हो रहे अवैध रेत खनन ने जलचक्र को प्रभावित किया है, जिससे भूजल स्तर तेजी से गिरा है। पहले जहां नदी का पानी इतना साफ था कि सिक्का भी दिख जाता था, वहीं अब नदी का तल सूखा और गर्मी सोखने वाला बन चुका है।
बांदा मंडल, जो कभी जल संसाधनों से समृद्ध माना जाता था, वहां अब नदियां, तालाब और कुएं तेजी से खत्म हो रहे हैं। करीब 20 नदियों और हजारों कुओं का अस्तित्व कमजोर पड़ चुका है, जिससे जल संकट और बढ़ गया है।
पर्यावरणीय असंतुलन का एक बड़ा कारण पहाड़ों में चल रही 400 से ज्यादा क्रेशर मशीनें भी मानी जा रही हैं, जिनसे लगातार धूल और खनन के कारण तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। वहीं जिले में हरियाली घटकर सिर्फ 3 प्रतिशत रह गई है, जिससे गर्म हवाओं का असर और भी खतरनाक हो गया है।
भौगोलिक रूप से बांदा का चट्टानी इलाका भी गर्मी को बढ़ा रहा है, क्योंकि पत्थर दिनभर गर्मी सोखकर रात में भी उसे छोड़ते रहते हैं, जिससे लोगों को रात में भी राहत नहीं मिल रही।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते जल संरक्षण, हरियाली बढ़ाने और अवैध खनन पर रोक नहीं लगी, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है। बांदा की यह स्थिति सिर्फ एक जिले की कहानी नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का परिणाम अब सीधे तापमान और जीवन पर दिख रहा है।
