जानकारी के अनुसार, महिला ने बच्चों को पंढरपुर से संभाजीनगर जा रही बस में अकेला छोड़ दिया। जाने से पहले उसने बेहद हैरान करने वाला कदम उठाते हुए दोनों बच्चों की जेब में एक चिट्ठी रख दी, जिसमें लिखा था कि उनके माता-पिता नहीं हैं और उन्हें यवतमाल पहुंचा दिया जाए। इस चिट्ठी में बच्चों के नाना का मोबाइल नंबर भी दर्ज था, ताकि किसी तरह संपर्क किया जा सके।
बस में सफर के दौरान जब बच्चे अकेले रोते हुए दिखाई दिए, तो कंडक्टर को उन पर शक हुआ। जांच करने पर जब उसने उनकी जेब में पड़ी चिट्ठी पढ़ी, तो पूरा मामला सामने आ गया। इसके बाद तुरंत पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस ने नंबर के आधार पर बच्चों के नाना से संपर्क किया और उन्हें बुलाया गया।
हालांकि, स्थिति तब और चौंकाने वाली हो गई जब बच्चों के नाना ने भी मासूमों को अपनाने से इनकार कर दिया। बताया गया है कि उन्होंने बच्चों की देखभाल करने के बजाय अपनी बेटी द्वारा घर से ले जाई गई स्कूटी और नकदी के बारे में सवाल किए। इससे बच्चों का भविष्य और अधिक अनिश्चित हो गया।
बाद में प्रशासन और पुलिस की मदद से दोनों मासूमों को सुरक्षित रूप से बाल कल्याण समिति की निगरानी में बीड के एक अनाथालय में भेज दिया गया, जहां उनकी देखभाल की जा रही है। अधिकारियों के अनुसार, बच्चों की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करना अब प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न है। जब जन्म देने वाले माता-पिता और नजदीकी रिश्तेदार भी बच्चों को अपनाने से पीछे हट जाएं, तो समाज की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक तनाव और सामाजिक दबाव जैसे पहलुओं की भी गहन जांच जरूरी है।
फिलहाल दोनों बच्चे सुरक्षित हैं, लेकिन उनका भविष्य अभी भी अनिश्चितता के घेरे में है। यह मामला एक बार फिर इस बात की याद दिलाता है कि बच्चों की देखभाल केवल कानूनी नहीं बल्कि मानवीय जिम्मेदारी भी है, जिसे किसी भी परिस्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
