बाजार में यह गिरावट केवल घरेलू कारणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि वैश्विक तनाव और आर्थिक अनिश्चितताओं ने भी निवेशकों का भरोसा कमजोर कर दिया। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान विवाद ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में डर का माहौल पैदा कर दिया, जिसका असर भारतीय बाजार पर भी साफ दिखाई दिया।
विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है। भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह स्थिति आर्थिक दबाव बढ़ाने वाली मानी जाती है, क्योंकि इससे महंगाई, आयात बिल और चालू खाते के घाटे पर असर पड़ सकता है।
इसके साथ ही भारतीय रुपये में भी बड़ी कमजोरी देखने को मिली। डॉलर के मुकाबले रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया, जिससे विदेशी निवेशकों की चिंता और बढ़ गई। रुपये की कमजोरी का असर विदेशी फंड्स के रिटर्न पर पड़ता है, जिसके कारण वे बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं।
विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली ने बाजार पर अतिरिक्त दबाव बनाया। बड़े वैश्विक फंड जोखिम कम करने के लिए लगातार भारतीय इक्विटी से दूरी बना रहे हैं। इसका असर खासतौर पर बड़े शेयरों और बैंकिंग सेक्टर में देखने को मिला, जहां भारी बिकवाली दर्ज की गई।
बाजार में गिरावट को और तेज करने में डेरिवेटिव एक्सपायरी का भी बड़ा योगदान रहा। कमजोर सेंटीमेंट के बीच ट्रेडर्स ने अपनी पोजीशन घटानी शुरू कर दी, जिससे अचानक वॉलेटिलिटी बढ़ गई और बाजार में गिरावट और गहरी हो गई।
सेक्टरवार प्रदर्शन की बात करें तो आईटी, रियल एस्टेट और वित्तीय सेवाओं से जुड़े शेयरों में सबसे ज्यादा कमजोरी देखी गई। निवेशकों को डर है कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती का असर टेक्नोलॉजी कंपनियों की कमाई पर पड़ सकता है। हालांकि कमोडिटी और ऑयल एंड गैस सेक्टर में कुछ मजबूती जरूर देखने को मिली, क्योंकि ऊंचे कच्चे तेल की कीमतों का इन कंपनियों को लाभ मिल सकता है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल बाजार दबाव वाले दौर में है और निवेशकों को सावधानी के साथ कदम उठाने की जरूरत है। उनका कहना है कि ऐसे समय में घबराहट में फैसले लेने से बचना चाहिए और मजबूत कंपनियों पर लंबी अवधि के नजरिए से ध्यान देना चाहिए।
फिलहाल निवेशकों की नजर वैश्विक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों के रुख पर बनी हुई है। आने वाले कारोबारी सत्रों में यही तय करेगा कि बाजार में स्थिरता लौटेगी या गिरावट का दबाव और बढ़ेगा।
