महान गायक मोहम्मद रफी ने अपनी मृत्यु से मात्र एक दिन पहले, 30 जुलाई 1980 को संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए अपना आखिरी गाना रिकॉर्ड किया था। फिल्म ‘आस पास’ का वह गीत था—’तू कहीं आसपास है दोस्त’। विडंबना देखिए कि इस गाने के बोल उनकी अपनी विदाई की आहट जैसे लग रहे थे। इसके अगले ही दिन 31 जुलाई को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। वहीं, हरफनमौला किशोर कुमार ने 12 अक्टूबर 1987 को फिल्म ‘वक्त की आवाज’ के लिए ‘गुरु गुरु आ जाओ गुरु’ गाना रिकॉर्ड किया और नियति का क्रूर मजाक देखिए कि ठीक अगले दिन 13 अक्टूबर को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। मिथुन चक्रवर्ती और श्रीदेवी पर फिल्माया गया यह गाना उनकी बहुमुखी प्रतिभा का अंतिम प्रमाण बना।
सुरों की मलिका लता मंगेशकर ने साल 2022 में अंतिम सांस ली, लेकिन उनकी जादुई आवाज का आखिरी स्पर्श साल 2018 और 2019 में महसूस किया गया। उन्होंने एक विशेष अवसर के लिए ‘गायत्री मंत्र’ को अपनी दिव्य आवाज दी थी, जबकि फिल्मी गीतों की बात करें तो 2019 में ‘सौगंध मुझे इस मिट्टी की’ उनका आखिरी रिकॉर्डेड गाना माना जाता है। इसी कड़ी में आशा भोसले ने भी अपने अंतिम समय तक संगीत से नाता नहीं तोड़ा। उन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय बैंड के साथ मिलकर ‘द शैडोई लाइट’ जैसे अनूठे प्रोजेक्ट पर काम किया, जो उनकी वैश्विक संगीत समझ को दर्शाता है। अप्रैल 2026 में उनके निधन से संगीत के एक और युग का अंत हो गया, लेकिन उनकी आवाज की ऊर्जा आज भी मौजूद है।
दर्दभरी और रूहानी आवाज के मालिक मुकेश का जाना भी संगीत प्रेमियों के लिए एक बड़ा सदमा था। 27 अगस्त 1976 को अमेरिका में एक कॉन्सर्ट के दौरान अचानक उनका निधन हो गया। जाने से पहले उन्होंने फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के लिए बेहद खूबसूरत और शुद्ध हिंदी शब्दों से सजा गीत ‘चंचल, शीतल, निर्मल, कोमल’ रिकॉर्ड किया था। आज जब ये गाने बजते हैं, तो ऐसा लगता है मानो ये कलाकार आज भी हमारे बीच मौजूद हैं। इन गीतों की रिकॉर्डिंग और उनके रिलीज होने के बीच की कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि कलाकार भले ही चला जाए, लेकिन उसकी कला और उसकी अंतिम स्मृतियां समय की सीमा को पार कर हमेशा के लिए अमर हो जाती हैं।
