मृतक की पहचान विजय राठौर के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि विजय उसी मकान के मालिक थे, जहाँ एमबीबीएस प्रथम वर्ष की छात्रा रोशनी किराए पर रहती थी। फरवरी माह में रोशनी का शव उसके बाथरूम में मिला था, जिसके बाद से ही विजय और उनका परिवार लगातार जांच के दायरे में और मानसिक तनाव में था।
आरोपों के घेरे में जांच और छात्रा के परिजन
विजय राठौर की आत्महत्या के बाद उनकी पत्नी करुणा राठौर ने व्यवस्था और छात्रा के परिजनों पर बेहद संगीन आरोप लगाए हैं। करुणा का कहना है कि उनके पति अपराधी नहीं थे, लेकिन छात्रा की मौत के बाद से उन्हें एक अपराधी की तरह प्रताड़ित किया जा रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि रोशनी के परिजन लगातार घर आकर उन्हें धमकाते थे और झूठे केस में फंसाने का दबाव बना रहे थे।
पत्नी का यह भी दर्द छलका कि पुलिस की कार्यप्रणाली ने विजय को मानसिक रूप से तोड़ दिया था। करुणा के अनुसार, पुलिस बार-बार बयान दर्ज करने के नाम पर विजय को थाने बुलाती थी और वहां घंटों बिना किसी ठोस वजह के बैठाकर रखा जाता था। सामाजिक लोक-लाज और लगातार पूछताछ के डर ने विजय को गहरे अवसाद (Depression) में धकेल दिया, जिसका परिणाम शनिवार की रात इस आत्मघाती कदम के रूप में सामने आया।
क्या था रोशनी सुसाइड केस?
मामले की जड़ें फरवरी 2026 की उस घटना में हैं, जब 19 वर्षीय छात्रा रोशनी ने अपने कमरे में खुदकुशी कर ली थी। उस वक्त मेडिकल कॉलेज के छात्रों और रोशनी के परिवार ने इसे हत्या करार देते हुए कोहेफिजा थाने का घेराव किया था। हालांकि, बाद में पुलिस को रोशनी के मोबाइल से एक ‘डिजिटल सुसाइड नोट’ मिला था, जिसमें उसने नीट और एमबीबीएस की पढ़ाई के अत्यधिक तनाव का जिक्र किया था। पुलिस ने मामले की गहराई से जांच के लिए एसआईटी (SIT) का गठन भी किया था, लेकिन अब तक कोई आपराधिक संलिप्तता साबित नहीं हुई थी।
पुलिसिया कार्रवाई और वर्तमान स्थिति
मकान मालिक की आत्महत्या के बाद कोहेफिजा पुलिस एक बार फिर रक्षात्मक मुद्रा में है। थाना प्रभारी केजी शुक्ला ने बताया कि विजय राठौर की मौत के मामले में मर्ग कायम कर लिया गया है। पुलिस फिलहाल उनकी बेटी के बेंगलुरु से आने का इंतजार कर रही है, जिसके बाद पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। पुलिस का कहना है कि वे इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या वाकई विजय पर किसी तरह का बाहरी दबाव था या उन्होंने किसी अन्य निजी कारण से यह कदम उठाया।
यह घटनाक्रम न केवल एक परिवार की तबाही की कहानी है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि किसी मामले की लंबी खिंचती जांच और सामाजिक दबाव किस तरह एक निर्दोष व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर घातक प्रहार कर सकते हैं। अब देखना यह होगा कि एसआईटी इन दोनों मौतों के अंतर्संबंधों की गुत्थी कैसे सुलझाती है।
