एलओसी से सटे उड़ी सेक्टर के गांवों में जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है। चुरुंडा, सिलिकोट, सलामाबाद, गिंगल और लगामा जैसे गांव, जो कभी गोलाबारी से थम गए थे, आज फिर खेतों की हरियाली और बच्चों की स्कूल वापसी से जिंदा नजर आने लगे हैं। छोटे कारोबार फिर शुरू हो चुके हैं, लेकिन हर चेहरे पर सतर्कता अब भी साफ झलकती है।
बीते संघर्ष के निशान अभी मिटे नहीं हैं। कई गांवों में घरों की दीवारों पर गोलियों और मोर्टार के निशान आज भी उस भयावह दौर की कहानी कहते हैं। चुरुंडा और सिलिकोट में दर्जनों घर क्षतिग्रस्त हुए थे, जबकि कई परिवारों ने अपने अपनों को खोया। लोगों की आंखों में आज भी वो खौफ जिंदा है, जब हर पल जान बचाने की जद्दोजहद थी।
स्थानीय लोग बताते हैं कि हालात अब शांत जरूर हैं, लेकिन यह शांति स्थायी नहीं बल्कि उम्मीद और डर के बीच सांस ले रही है। ग्रामीणों की सबसे बड़ी मांग आज भी सुरक्षा से जुड़ी है—कई गांवों में अब तक पर्याप्त बंकर नहीं हैं, जबकि सीमावर्ती इलाकों में खतरा कब बढ़ जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।
पुंछ और आसपास के इलाकों में भी हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं। गोलाबारी में तबाह हुए सैकड़ों घर अब फिर से खड़े हो गए हैं। सरकार की मदद और लोगों की मेहनत से दीवारें तो दोबारा बन गईं, लेकिन अपनों को खोने का दर्द आज भी उतना ही गहरा है। कई परिवार ऐसे हैं, जो उस दर्दनाक घटना के बाद आज तक अपने घर लौट नहीं पाए।
सीमावर्ती इलाकों में अब सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की मांग तेज हो गई है। स्थानीय प्रतिनिधियों का कहना है कि अब वक्त आ गया है कि बंकरों की संख्या बढ़ाई जाए, आधुनिक तकनीक से सुरक्षा तंत्र को मजबूत किया जाए और आपातकालीन सेवाओं को बेहतर बनाया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बेहतर तरीके से निपटा जा सके।
हालांकि, इस पूरे दौर में भारतीय सेना की भूमिका को लोग सबसे बड़ा सहारा मानते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सेना की चौकसी ही उनका आत्मविश्वास बनाए रखती है। खेतों में काम करते किसान और आंगन में खेलते बच्चे इस बात के गवाह हैं कि जिंदगी आगे बढ़ रही है—डर के साथ, लेकिन हौसले के दम पर।
एक साल बाद तस्वीर साफ है ऑपरेशन सिंदूर ने दुश्मन को करारा जवाब दिया और सीमा पर बड़ी घटनाओं पर रोक लगी। पाकिस्तान की ओर से बड़े हमलों में कमी आई है, जिससे लोगों में भरोसा बढ़ा है।
फिर भी, सीमावर्ती गांवों की असली कहानी यही है जख्म अभी भी ताजा हैं, यादें अब भी दर्द देती हैं, लेकिन इन सबके बीच उम्मीद जिंदा है। लोग कहते हैं “डटे थे, डटे हैं और डटे रहेंगे।” यही जज्बा इन इलाकों को आगे बढ़ा रहा है और यही विश्वास है कि आने वाले समय में यह शांति स्थायी रूप लेगी।
