अमेरिका ने इजरायल, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को करीब 8.6 अरब डॉलर (करीब 82 हजार करोड़ रुपये) के हथियार और सैन्य सिस्टम देने की मंजूरी दी है। इस फैसले को अमेरिकी विदेश विभाग ने ‘आपात राष्ट्रीय सुरक्षा’ का मामला बताते हुए तेजी से आगे बढ़ाया। इसमें एडवांस्ड प्रिसिजन किल वेपन सिस्टम (APKWS), पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम और बैटल कमांड सिस्टम जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं, जो मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने में बेहद अहम माने जाते हैं।
दरअसल, हाल के महीनों में ईरान की ओर से इजरायल और खाड़ी देशों पर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद इन देशों के डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव पड़ा है। ऐसे में अमेरिका अपने सहयोगियों के हथियारों के स्टॉक को फिर से मजबूत कर रहा है, ताकि किसी बड़े हमले की स्थिति में वे तैयार रहें।
इस बीच डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का रुख भी सख्त बना हुआ है। अमेरिका और इजरायल दोनों ही ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमता को खत्म करने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं। दूसरी ओर ईरान भी पीछे हटने के मूड में नहीं है और वह अपने प्रॉक्सी समूहों तथा मिसाइल कार्यक्रम के जरिए जवाबी रणनीति मजबूत कर रहा है।
स्थिति को और संवेदनशील बनाता है हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां अमेरिका की नौसेना की मौजूदगी और नाकेबंदी के चलते वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ रहा है। यह इलाका दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है और यहां किसी भी सैन्य टकराव का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
अभी भले ही सीजफायर लागू है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दोनों पक्ष लगातार अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं। इजरायल हाई अलर्ट पर है, अमेरिका लगातार हथियारों की सप्लाई बढ़ा रहा है और ईरान भी अपने नेटवर्क के जरिए दबाव बनाए हुए है।
कुल मिलाकर, शांति की कोशिशों के बीच हथियारों का यह बड़ा खेल साफ संकेत दे रहा है कि मिडिल ईस्ट में हालात बेहद नाजुक हैं। अगर बातचीत में प्रगति नहीं हुई, तो यह टकराव किसी भी वक्त बड़े युद्ध का रूप ले सकता है, जिसका असर सिर्फ क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया को झटका दे सकता है।
