मृत्यु पर पतिव्रत धर्म की विजय का पर्व है वट अमावस्या

वट अमावस्या पर सुहागिनों ने अपने पति की दीर्घायु के लिए की वट वृक्ष की पूजा

झांसी। गुरुवार की सुबह से ही सुहागिन स्त्रियों ने अपने सुहाग की दीर्घायु के लिए वट अमावस्या पर बरगद के वृक्ष की पूजा अर्चना की। 16 श्रृंगार किए सुहागिनों ने कच्चे सूत के धागे से परिक्रमा करते हुए उसे बट वृक्ष पर लपेटा और पूजा की। साथ ही सावित्री व सत्यवान समेत अपने ईष्ट देव को मनाया। विद्वानों के अनुसार इस पर्व को मृत्यु पर पतिव्रत धर्म की विजय का पर्व भी कहा जाता है।

बताते चलें कि ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को ही बर अमावस्या के नाम से जाना जाता है। दरअसल इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा होती है इसलिए इसे बर मावस कहते हैं। वहीं कई जगह इसे बड़ अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए वट सावित्री व्रत रखती हैं। इसके अलावा इस दिन शनि जयंती भी मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अमावस्या के दिन ही सावित्री के पति सत्यवान को प्राण दान मिला था। कहते हैं तभी से इस अमावस्या का महत्व बढ़ता चला गया।

बर अमावस्या के दिन सभी सुहागन महिलाएं व्रत रखती हैं और 16 श्रृंगार कर बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। मान्यता है इस व्रत को करने से पति को लंबी आयु की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथा के अनुसार बर अमावस्या के दिन ही सावित्री ने यमराज से अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। इसी कारण ऐसी मान्यता चली आ रही है कि जो भी स्त्री इस दिन सच्चे मन से व्रत करती है उसके पति पर कभी कोई संकट नहीं आता।

 

बरगद के पेड़ की पूजा

बर अमावस्या के दिन महिलाएं बरगद के पेड़ के नीचे सावित्री- सत्यवान व अन्य इष्टदेवों का पूजन करती हैं। मान्यता है ऐसा करने से महिलाओं को सुखद और संपन्न दांपत्य जीवन का वरदान प्राप्त होता है। वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक मतानुसार बरगद और पीपल के वृक्ष सर्वाधिक प्राणवायु ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। और यही वह वजह है कि हमारे पूर्वज प्रकृति की पूजा1 करते रहे हैं। इसीलिए पर्यावरण संरक्षण के लिए भी इस दिवस को महत्वपूर्ण माना जाता है।

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